शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४० [ श्री शारदा तिलक से संयुक्त पायस को निवेदित करे । कुशाओं से कुम्भों का स्पर्श करके साग्रशत-शत विद्या का जप करना चाहिए ।६८। अभिषिञ्चेद्विलोमेन साध्यं त दत्तदक्षिणम् । सर्वपापक्षयकरं शुभदं शान्तिसिद्धिदम् । ६६ कृत्याद्रोहादिशमनं सौभाग्यश्रीजयप्रदम् । पुत्रप्रदं च वन्ध्यागामभिषेकमम्विदुः ।१०० ज्वरार्त्तं स्वपूरः स्थित्वा जपेत्साग्रं सहस्रकम् । ज्वरो नश्यति तस्याश क्षुद्रभूतग्रहा अपि ।१०१ परतेजसि सञ्चिन्त्य शुभ्रं स्रुतसुधामयम् । विधुं विद्यां जपेद्योगो त्रिषरोगविनाशकृत् ।१०२ बलीपलितरोगघ्नः क्षुत्पिपासाप्रणाशनः । पुष्टिदः सर्वसौभाग्यदायी लक्ष्मीशुभप्रदः ।१०३ विलोम से दी हुई दक्षिणा वाले उस साध्य का अभिषिञ्चन करना चाहिए । यह अभिषेक समस्त पापोंके क्षय कर देने वाला शुभोंका दाता और शान्ति तथा सिद्धि के देने वाला होता है । यह कृत्या के दोषों का प्रशमन करने वाला—सौभाग्य, श्री और जय के देने वाला है । यह अभिषेक वन्ध्या नारी को पुत्र प्रदान करने वाला होता है । ।६६-१०० जो मनुष्य ज्वर से आर्त्त होवे उसके आगे स्थित होकर साग्रसहस्र वार जप करे तो उसका ज्वर शीघ्र ही नष्ट हो जाया करता है और क्षुद्र भूत ग्रह भी विनष्ट हो जाया करते हैं ।१०१। पर तेज में शुभ्र स्रुत सुधामय को सञ्चिन्त्य करके विधु विद्या का जप करे तो यह योग विष- रोग के विनाश करने वाला होता है ।१०२। वली और पलित के रोग का नाशक तथा क्षुधा और पिपासा के विनाश करने वाला है। यह पुष्टि का दाता—सब प्रकार के सौभाग्य का प्रदाता और लक्ष्मी एव शुभ का देने वाला है ।१०३। सोमसूर्याग्निरूपाः स्युर्वर्णाः लोहत्रयं तथा । रौप्यमिन्दुः स्मृतो हेम सूर्य्यताम्रं हुताशनः ।१०४