भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 141

षष्ठ पटल ] १४१ लोहभागाः समुद्दिष्टाः स्वरात्तक्षरसंख्यया । तैर्लोहैः कारयेन्मुद्रामसङ्कलितसङ्गताम् ॥१०५ साग्रं सहस्रं सञ्जप्य स्पृष्ट्वा यां जुहुयात्ततः । तस्यां सम्पातयेन्मन्त्री सर्पिषा पूर्वसंख्यया ।१०६ निःक्षिप्य कुम्भे तां मुद्रामभिषेकोक्तवर्त्मना । आवाह्य पूजयेद्देवीमुपचारैः समाहितः ।१०७ अभिषिच्य विनीताय दद्यात्तां मुद्रिकां गुरुः । इयं रक्षः क्षुद्ररोगविषज्वरविनाशिनी ।१०८ व्यालचौरमृगादिभ्यो रक्षां कुर्याद्विशेषतः । युद्धे विजयमाप्नोति धारयन्मनुजेश्वरः ।१०६ विभजेन्मातृकां मन्त्री नव वर्गान्यथाक्रमात् । अष्टावष्टौ स्वराः स्पर्शाः पंचशो व्यापका अपि ।११० तीन प्रकार के लोह सोम-सूर्य और अग्नि के स्वरूप वाले हैं। इनके वर्ण इसी प्रकार के होते हैं। रौप्य (चाँदी) चन्द्रमा है, हेम सूर्य कहा गया है और ताम्र अग्नि है ।१०४। लोह भाग स्वर आदि अक्षरों की संख्या से समुद्दिष्ट किये गये हैं। उन लोहों के द्वारा असंकलित अर्थात् अमिलित से सङ्गत मुद्रा करनी चाहिए ।१०५। साग्र अर्थात् अष्टाधिक एक सहस्र भली भांति जप करके उमका स्पर्श करके फिर होम करना चाहिए । मन्त्रधारी उसमें पूर्व संख्या से घृत से सम्पातन करे ।१०६! उस मुद्रा को अभिषेक में कहे हुए मार्ग से कुम्भ में निक्षिप्त करके देवी का आवाहन करके पूजनोपचारों के द्वारा सावधान होकर पूजा करे ।१०७। गुरु अभिषेक करके उन मुद्राओं को विनीत साधक को दे देवे । यह मुद्रा राक्षस, क्षुद्र रोग, विष और ज्वर का विनाश करने वाली होती है ।१०८। विशेष रूप से व्याल, चोर और पशु आदि से रक्षा किया करती है । राजा इसको धारण करता हुआ युद्ध में विजय को प्राप्त किया करता है ।१०६। मन्त्रधारी मातृका को यथा क्रम नौ वर्गों में विभाजित करे । आठ-आठ स्वर हैं और स्पर्श पाँच व्यापक भी हैं ।११०

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 141, कुल 511 में से · BharatKosha