शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२ ] [ श्री शारदा तिलक नव वर्गाः समुत्पन्ना नवरत्नेश्वरा ग्रहाः । अर्केन्दुरक्तज्ञगुरुभृगुमन्दाहिकेतवः ।१११ माणिक्यं मौक्तिकं चारु विद्रुमं गारुडं पुनः । पुष्परागं लसद्वज्रं नीलं गोमेदिकं शुभम् ।११२ वैदूर्यं नव रत्नानि मुद्रान्तैः कल्पयेच्छुभाम् । जपहोमादिकं सर्वं कुर्यात्पूर्वोक्तवर्त्मना ।११३ योमुद्रां धारयेदेनां तस्य स्युर्वंशगा ग्रहाः । वर्द्धते तस्य सौभाग्यं लक्ष्मीरव्याहता भवेत् ।११४ कृत्याद्रोहा विनश्यन्ति नश्यन्ति सकलापदः । रक्षोभूतपिशाचाद्या नेक्षन्ते तं भयाकुलः ।११५ उपर्युपरि वर्द्धन्ते धनरत्नादिसम्पदः ।११६ तार्तीयोज्ज्वलकाणकं स्वरयुगैराविर्भवत्केसरम् वर्गोद्भासिवसुच्छेद वसुमतीगेहेन सम्वेष्टितम् । ताराधीश्वरवारिवर्णविलसद्धिक्कोणसंशोभितम् यन्त्रं वर्णतनोः पदं निगदित सर्वामयघ्नं परम् ।११७ नौ वर्ग उत्पन्न हुए। नौ रत्न हैं और नौ ग्रह होते हैं। उन ग्रहों के नाम—सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, भृगु, शनि, राहु और केतु ये होते हैं ।१११। माणिक्य, मौक्तिक, विद्रुम, गारुड, पुष्पराग, वज्र, नीलम, गोमेद, चारु ये रत्नों के नाम होते हैं ।११२। उनमें वैदूर्य— नवरत्न से शुभमुद्रा की कल्पना करनी चाहिए । जप और होम आदि सब पूर्व में बताये हुए मार्ग से करे ।११३। जो पुरुष इस मुद्रा को धारण किया करता है उसके वश में गमन करने वाले सभी ग्रह हुआ करते हैं । उस पुरुष का सौभाग्य बढ़ा करता है और उसकी अव्याहत गति होती है ।११४। कृत्या कृत द्रोह विनिष्ट हो जाया करते हैं और सभी आपदाएं विनाश को प्राप्त हो जाया करती हैं । राक्षस, भूत और पिशाच आदि तो भय से बेचैन होकर उसकी ओर अपनी दृष्टि भी नहीं डाला करते हैं ।११५। धन और रत्नों आदि की सम्पदायें