शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 143, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम पटल ] [ १४३ ऊपर-ऊपर हो जाने की उस मनुष्य के गृह में स्पर्धा किया करती हैं अर्थात् एक दूसरों से अत्यधिक बढ़ जाने की होड़ किया करती हैं ।११६। अब एक मन्त्र बतलाया जाता है—तार्त्तीय—कर्णिका बीज— ताराधीश्वर, वारिवर्ण—वकार इनसे शोभित कोण ओर दिशा से भूषित, तार्ती से उज्ज्वल कोण युक्त दो स्वरों से आविर्भूत केसर वाला- वर्गोद्भासी आठ मन्त्रों वाला भूपुर से संवेष्ठित यह वर्णतनु का मन्त्र कहा गया है, जो सब भयों का नाशक होता है ।११७। ———
सप्तम पटल
अथ भूतलिपिं वक्ष्ये सुगोप्यमतिदुर्लभम् । यां प्राप्य शम्भोर्मु नयः सर्वान्कामान्प्रपेदिरे ।१ पञ्च ह्रस्वाः सन्धिवर्णा व्यामेराग्निर्जलन्धरा । अन्त्यमाद्यं द्वितीयं च चतुर्थं मध्यमं क्रमात् ।२ पञ्च वर्गाक्षराणि स्युर्वान्तश्वतेन्दुभिः सह । एषा भूतलिपिः प्रोक्ता द्विचत्वारिंशदक्षरैः ।३ आयम्बराणं वर्गाणां पञ्चमाः शार्णसंयुताः । वर्गाद्या इति विज्ञेया नव वर्गाः स्मृता अमी ।४ व्योमेराग्निजलक्षोणी वर्गवर्णान्पृथक् विदुः । द्वितीयवर्गे भूर्न स्यान्नवमे जल धरा ।५ इसके अनन्तर भूत लिपि के विषय में बतलायेंगे जो बहुत ही सुगोपनीय हैं और अत्यन्त दुर्लभ है । जिसको शम्भु से प्राप्त करके मुनिगण ने अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लिया था ।१। पाँच ह्रस्व हैं—यथा—अ इ उ ऋ लृ, सन्धि वर्ण—ए-ऐ-ओ-औ है क्योंकि अकार और इकार की सन्धि होने पर ही 'ए' बनता है । व्योम—