भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 511 में से

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१४४ [ श्री शारदा तिलक हकार, ई, ऐ—यकार, अग्नि—रकार, जल—वकार धरा—लकार— यह तीसरा वर्ग होता है। अन्त्य अर्थात् अन्त में होने वाला ङकार और आद्य अर्थात् आदि में रहने वाला—ककार । द्वितीय—खकार, चतुर्थ घकार मध्यम—गकार, यही क्रम चारों में होता है। इस प्रकार के वर्गों का अष्टक होता है। पांच वर्ग के अक्षर होते हैं दान्त—शकार, चेतः—षकार, इन्दु—सकार । यह भूतलिपि ब्यालीस अक्षरों की कही गयी हैं। २।३। अम्बराणं का अर्थ हकार होता है। अ-ए और अम्बराणं इनमें द्वन्द्व समास होता है। वर्गाणं का अर्थ अ-क-च-र-त-प-य और श अर्थ है। ये वर्गों के आद्य अक्षर होते हैं। ये नौ वर्ग कहे गये हैं ।४। अब वर्णों के अक्षरों की भूत स्वरूपता बतलायी जाती है—अर्थात् नौ वर्गों के प्रथम आदि वर्ण व्योम आदि नामों वाले होते हैं । आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि इन वर्गों के वर्णों को पृथक्-पृथक् जानना चाहिये । द्वितीय वर्ग में भू नहीं है और नवम में जल और धरा नहीं है ।५। विरिञ्चिविष्णुरुद्राश्विप्रजापतिदिगीश्वराः । क्रियादिशक्तिसहिताः क्रमात्स्युर्वर्गदेवताः ।६ ऋषिः स्याद्दक्षिणामूर्तिगायत्रं छन्द ईरितम् । देवता कथिता सद्भिः साक्षद्वर्णेश्वरी परा ।७ हादिषड्वर्गकैः कुर्यात्षडङ्गानि सजातिभिः । ध्यायेल्लिपतरोर्मूले देवीं तन्मयपङ्कजे ।८ वदन्ति सुधियोवृक्षं नित्यं वर्णमयं शुभम् । परसञ्चिन्महाबीजं विन्दुनादमहाशिखम् ।६ पृथिव्यक्षरशाखाभिः सर्वाशासु विजृम्भितम् । सलिलाक्षरपत्रैःस्वैस्संछादितजगत्त्रयम् ।१० अब नौ वर्गों के देवता बतलाये जाते हैं—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, अश्वि प्रजापति और दिगीश्वर अर्थात् यम, वरुण और सोम ये क्रिया आदि शक्ति के सहित क्रम से वर्गों के देवता होते हैं ।६। इसका ऋषि दक्षिणा-

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