शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम पटल } [ १४५ मूर्त्ति है और छन्द गायत्र कहा गया है। इसका देवता सत्पुरुषों के द्वारा साक्षात् परा वर्णेश्वरी कही गयी है ।७। हकार से आदि सजाति षड् वर्गों के द्वारा षड अङ्गों को करना चाहिए। लिपि वृक्ष के मूल में तत्स्वरूप पंकज में देवी का ध्यान करना चाहिए ।८। सुधीगण इसको वर्णमय परम शुभ और नित्य वृक्ष कहते हैं। इसका परसम्वित् महा- बीज है और विन्दुनाद महाशिफा है ।६। पृथिवी के अक्षरों की शाखाओ से सभी दिशाओं में विजृम्भित है । अपने सलिलाक्षर सत्रों से तीनों जगतों को आच्छादित करने वाला है ।१०। वह्निवर्णांऽकुरैर्दीप्तं रत्नैग्वि सुरद्रुमम् । मरुद्वर्ण लसत्पुष्पैर्द्योतन्तं वपुः श्रियम् ।११ आकाशार्णफलैर्नम्यं सर्वभूताश्रयं परम् । पर मृताख्यमधुभिस्सिञ्चन्त परमेश्वरीम् ।१२ वेदागमादिभिः कॢप्तं समुन्नतिमनोहरम् । शिवशक्तिमयं साक्षात् छाया श्रितगतत्रयम् ।१३ एनमाश्रित्य मुनयः सर्वान्कामानवाप्नुयुः ।१४ अङ्कोन्मत्तशशाङ्ककोटिसदृशीमापीनतुङ्गस्तनीम् चन्द्राङ्काङ्कितमस्तकां मधुमदादालोलनेत्रयाम् । विभ्राणामनिशं वरं जपवटीं विद्यां कपालं करै सन्दृप्त्यां यौवनगर्वितां लिपितनुं वागीश्वरीमाश्रये ।१५ रत्नों से सुरद्रुम की ही भाँति यह वहिन वर्णों के अंकुरों से दीप्त है। मरुद् वर्णों से शोभित पुष्पों के द्वारा वपु की श्री को द्योतित करने वाला है ।११। आकाश वर्णों के स्वरूप वाले फलों से नम्र और सर्वभूतों का आश्रय स्थल है । परामृत नामक मधुओं से परमेश्वरी का सिञ्चन करता हुआ है ।१२। यह वेदों आगमों आदि से कॢप्त है तथा भली भाँति उन्नति ऊँचाई से मनोह है। यह साक्षात् शिव शक्ति से परिपूर्ण साक्षात् भ्रू छाया से तीनों जगतों का आश्रय दिए हुए हैं ।१३। मुनिगण इस प्रकार से इस का समाश्रय ग्रहण करके सभी कामनाओं