शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 146, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१४६ ] [ श्री शारदा तिलक कामनाओं को प्राप्त करते थे ।१४। अब ध्यान बतलाते हैं—अंक में करोड़ों उन्मत्त चन्द्रों के सदृश है, थोड़े पीन (स्थूल) और ऊँचे कुच- युगों वाली, अर्ध चन्द्र से अंकित मस्तक से युत, मधु के मद से ईषत् चञ्चल तीन नेत्रों से अन्वित, करकमलों में निरन्तर वरदान—जपवटी, विद्या, कपाल को धारण करने वाली, यौवन के गर्व से संदृप्त, लिपि के तनुवाली भगवती वागीश्वरी का मैं समाश्रय ग्रहण करता हूँ ।१५। आधारदेशेऽधिष्ठाने नाभौ हृदि गले पुनः । विन्दौ नादे ततः शक्त्यां शिवे देशिकसत्तमः ।१६ नवाधारेषु विन्यस्य स्वरान्नव यथाविधि । हादिवर्णांस्तनौ न्यस्येन्मुखे ऊर्ध्वादितः सुधीः ।१७ ऊर्ध्वमाहेन्द्रयाम्योदक्पश्चिमेषु समाहितः । दोः पत्सु पञ्चवर्गाणां वर्णान्देशिकसत्तमः ।१८ अग्रमूलोपमूलाग्रमध्यदेशक्रमेण तु । जठरे पार्श्वयुगले नाभौ पृष्ठे समाहितः ।१९ गुह्यहृद्भ्रूविले न्यस्येत शादिवर्णत्रयं क्रमात् । सृष्टौ सर्गाविसना स्यात्स्थितौ वह्निमरुत्पयः ।२० वियद्भूमिक्रमान्न्यस्येद्बिन्दुसर्गाविसानिकाम् । संहृतौ प्रतिलोमेन विन्यसेद्बिन्दुभूषिताम् ।२१ श्रेष्ठ आचार्य आधार देश में, अधिष्ठान में, नाभि में, कण्ठ में, विन्दु में, नाद में, शिव में, शक्ति में नवाधारों में विन्यास करके फिर नौ स्वरों को विधि पूर्वक सुधी हकार से आदि वर्णों को स्तनों में न्यास करे और मुख में ऊर्ध्वादि से करे ।१६।१७। ऊर्ध्व में समाहित होकर माहेन्द्री, याम्य, उत्तर और पश्चिम में न्यास करे । श्रेष्ठ आचार्य पाँचों वर्गों के वर्णों का बाहुओं और पादों में न्यास करे । अग्रमूल, उपमूलाग्र और मध्य देश के क्रम से समाहित होकर जठर में, पार्श्वों के युगल में अर्थात् दोनों पार्श्वों में, नाभि में, पृष्ठ में