शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्री शारदा तिलक प्रथम पटल शब्दब्रह्म यदूचिरे सुकृतिनश्चैतन्यतर्गतम् । तद्बोऽव्यादर्निशं शशाङ्कसदनं वाचामधीशं महः । १ अन्तःस्मितोल्लसितमिन्दुकलावतंस-मिन्दीवरोदरसहोदरनेत्रशोभि। हेतुस्त्रिलोकविभवस्य नवेन्दुमौले-रन्तःपुरं दिशतुमंगलमादराद्वः ।२ संसारसिन्धोस्तरणैकहेतून्दधे गुरून्मूर्द्धिन शिवस्वभावान् । रजांसि येषां पदपङ्कजानां तीर्थाभिषेकश्रियमावहन्ति ।३ सारं वक्ष्यामि तन्त्राणां शारदातिलकं शुभम् । धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राप्तेः प्रथमकारणम् ।४ शब्दार्थसृष्टिर्मुनिभिश्चन्दोभिर्देवैतैः सह । विधिश्च यन्त्रमन्त्राणां तन्त्रेऽस्मिन्नभिधीयते ।५ जिसको सुकृती गण अन्तर्गत चैतन्य को शब्द ब्रह्म कहते थे वह शशांक सदन-वाणियों का अधीस तेज आपकी निरन्तर रक्षा करे ।१। अन्तर में स्मित से उल्लासित-इन्दु (चन्द्र) की कला के भूषण वाले- इन्हीं वरके उदर के सहोदर नेत्रों की शोभा से समन्वित-तीनों लोकों के वैभव के कारण ऐसे भवेन्दु मौलि (शिव) का अन्तःपुर आदर से आपका मङ्गल करे ।२। संसार रूपी सागर से सन्तरण करने के एक हेतुभूत-शिव के स्वभाव वाले गुरुओं को मस्तक में धारण किया था। जिनके चरणों कमलोंकी रजतीर्थों द्वारा हुए अभिषेक की श्री का आवा- हन किया करते हैं ।३। उन तन्त्रों के सारस्वरूप इस परम शुभ