भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 14

१० ] [ प्रथम पटल शारदा तिलक को बतलाऊँगा जो धर्म-अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ति का प्रथम कारण है ।४। छन्दों और देवताओं के साथ मुनियों से शब्दार्थ की सृष्टि और मन्त्रों तथा यन्त्रों की विधि इस तन्त्र में निहित की जाती है ।५। निर्गुणः सगुणश्चेति शिवो ज्ञेयः सनातनः । निर्गुणः प्रकृतेरेन्यः सगुणः सकलः स्मृतः ।६ सच्चिदानन्दविभात्सकलात्परमेश्वरात् । आसीच्छक्तिस्ततोनादो नादाद्बिन्दुसमुद्भवः ।७ परशक्तिमयः साक्षात्त्रियाऽसौ भिद्यते पुनः । बिन्दुनादो बीजमिति तस्य भेदाः समीरिताः ।८ ब्रिन्दुः शिवात्मको बीजं शक्तिर्नादस्मयोर्मिथः । समवायः समाख्यातः सर्वागमविशारदैः ।६ रौद्री विन्दोस्ततो नादाज् ज्येष्ठा बीजादजायत । वा - ा, ताभ्यः समुत्पन्ना रुद्रब्रह्मरमाधिपाः ।१० भगवान् सनातन शिव निर्गुण और सगुण जानना चाहिए । प्रकृति ा अन्य निर्गुण होते हैं और सकल सगुण कहे गये हैं । ६ । सत्-चित् ज्ञान ) और आनन्द के विभव से सकल परमेश्वर से शक्ति हुई थी फिर उससे , नाद हुआ और नाद से बिन्दु का समुद्भव हुआ था । ७ । पर शक्ति से परिपूर्ण यह साक्षात् फिर तीन प्रकार से भेद को प्राप्त होता है । बिन्दु-नाद और बीज में उसके भेद कहे गये हैं ।८। बिन्दु शिव के स्वरूप वाला है । बीज-नाद और शक्ति परस्पर में उन दोनों का है । समस्त आगमों के महामनीषियों के द्वारा यह समवाय कहा गया है । ६ । बिन्दु रौद्री फिर नाद बीज से ज्येष्ठा समुत्पन्न हुई थी यह वामा थी । फिर उनसे रुद्र ब्रह्मा और रमापति समुत्पन्न हुए थे । ।१०। सज्ञानेच्छाक्रियात्मानो वह्नीन्द्वर्कस्वरूपिणः । भिद्यमानात्पराद्बिन्दोरव्यक्तात्मा रवोऽभवत् ।११ भो