भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 153

सप्तम पटल ] [ १५३ के उदय शत्रु के गृह के द्वार में वायव्य में खोदकर रक्खें तो शत्रु का उच्चाटन करने वाला होता है अथवा निश्चित रूप से मृत्यु हो जाती है ।५६। अब आग्नेय को बतलाया जाता है—श्रवण—(उः) सद्य ओ, अर्धेन्दु—विन्दु इनमें युक्त वह्नि के बीज दो अर्थात् दो रेफ, हृन्नमः७ यह पद और फट् होवे—यह मन्त्र मध्य में विहित होवे । पोषक साध्य के अक्षरों से युक्त वह्नि निरोधित वर्णों को पत्रों में लिखना चाहिए अनय को अन्तिम दल लिखे और कृशानुपुर में जर करके भोज पत्र में कल्पित करे ।५७। शुभ वार नक्षत्र के संयोग में लाक्षा और कुम्कुम से निर्माण किया हुआ यह समस्त प्राणियों की रक्षा करने वाला आग्नेय यन्त्र होता है—ऐसा कहा गया है ।५८। वह घातक अक्षरों से मिश्रित कृत्तिका में मंगल के उदय में चिता के अङ्गार से उसके वस्त्र पर लिखे तो यह रिपु का नाश कर दिया करता है ।५६। नासार्द्धेन्दुमदम्बु तन्मनुयुतं सार्द्धेन्दुडेन्तोविधु- विध्वन्तेतु भुवे नमोविगदितो मध्ये मनुर्वारुणान् । वर्णान्पत्रपुटेषु वाक्षरपुटान्साध्यस्य वन्ध्वक्षरै- रालिख्याप्यपुरेण वेष्टितमिदं यन्त्रं भवेद्वारुणम् ।६० भूर्जपत्रे लिखेदेतद्रक्तचन्दनवारिणः । तरुणत्रोंदये काव्ये यन्त्रं वश्यादिकृद्भवेत् ।६१ गण्डो बिन्दुविभूषितोवसुमती स्यात्तादृशी गण्डयो मध्यस्थौ तु जगौ लुके नतिरिमि मन्त्रं लिखेन्मध्यतः । लान्ताल्लांपुटीकृतान्वसुमतीवर्णान् दलेष्वालिखे- त्सेवावर्णयुतान्यथाविधि भुवो गेहेन संवेययेत् ।६२ ज्येष्ठायामुदिते सौम्ये मृदि गैरिकनिर्मितम् । पार्थिवं यन्त्रमचिरात्सर्वत्र स्तम्भकृद् भवेत् ।६३ अब वारुण यन्त्र बतलाते हैं—नासा-ऋः, अर्द्धेन्दु, विन्दु-अम्बुक।, मनु शब्द का अर्थ चतुर्दशवां स्वर है अतः मनु से ओंकार कहा जाता है । इससे युत हो और चतुर्थी के अन्त वाला विधु होवे । फिर भुवे नमः— यह होना चाहिए । मध्य में मन्त्र होवे । फिर वकाराभूर पुटित

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 153, कुल 511 में से · BharatKosha