भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 154

१५४ ] [ श्री शारदा तिलक साध्य के वन्धु अक्षरों के सहित वारुण वर्णों को पद्मपुटों में लिखकर आप्यपुर से वेष्टित करे तो यह वारुण यन्त्र हो जाता है। ६०। इस मंत्र को रक्त चन्दन के जल से भोज्य पत्र पर लिखना चाहिए। तरुण नक्षत्र के उदय में भृगु वार में बनावे तो यह यन्त्र वश आदि के करने वाला होता है। ६१। पार्थिव मन्त्र बतलाते हैं—गण्ड—लृं', वसुमती—लकार गण्ड विन्दु से युक्त होवे। गण्ड वर्णों के मध्य में स्थित ज और ग—ये वर्ण होवे। लुके स्वरूप है। अन्त में नमः—यह होता है। इस मन्त्र को मध्य में लिखे। ल वर्ण से पुटीकृत लान्त वसुमती के वर्णों को दलों में लिखना चाहिए जो सेवा वर्ण युक्त होवे। विधि के साथ भूपुर वेष्टित करे। ६२। ज्येष्ठा ! नक्षत्र के उयय में सौम्य में मिट्टी में गैरिक से निर्मित यह पार्थिव यन्त्र शीघ्र ही सर्वत्र स्तम्भन करने वाला होता है। ६३। गुह्याद्गुह्यतरां नित्यां श्रीभूतलिपिदेवताम् । यः सेवते शुभैः पुत्रैर्धनधान्यैश्च पूर्यते। ६४ अत्रिर्व्वरुणसंरुद्धो द्वाग्वादिनि ठद्वयम् । वागीश्वर्या दशार्णोऽयं मन्त्रो वाग्विभवप्रदः। ६५ ऋषिःकण्वोविराट्छन्दो देवता श्राकसमीरिता । शिरः श्रवण दृङ् नासावदनान्धुगुदेष्विमान्। ६६ न्यस्यार्णान् प्राग्वदङ्गानि मातृकोक्तानि कल्पयेत्। ६७ तरुणसकलमिन्दोर्विभ्रतीशुभ्रकान्तिः कुचभरनमिताङ्गी सन्निषण्णा सिताब्दे । निजकरकमलद्यल्लेखनीपुस्तकश्रीः सकलविभवसिद्धयै पातु वाग्देवता नः। ६८ यह गुह्य से भी अधिक गुह्य है। इस नित्या श्री भूत लिपि देवता को जो सेवन दिया करता है वह शुभ-पुत्र और धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाया करता है। ६४। अत्रि—हकार, वरुण—वकार। इससे सम्पु- टित होवे। फिर द्वाग्वादिनि और फिर दो ठकार होवें। यह वागी- श्वरी का दश वर्णों का मन्त्र होता है जो वाग्विभव के देने वाला है। ६५