शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 155, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम पटल ] [ १५५ इस मन्त्र का ऋषि कण्व है और विराट् छन्द है तथा वाक् इसका देवता बताया गया है। शिर, श्रवण, नेत्र, नासिका, मुख, अन्धु और गुदा में इन वर्णों का न्यास करके पूर्व की ही तरह मातृका में कथित अंगों की कल्पना करनी चाहिए ।६७। अब ध्यान बतलाया जाता है- चन्द्र के एक खण्ड को धारण करने वाली, शुभ्र क्रान्ति से संयुत, कुच युग भार से नमित अङ्ग वाली, सितकमल पर विराजमान, अपने करों में लेखनी, पुस्तक श्री को धारण करती हुई वह वाग्देवता सम्पूर्ण वैभव की सिद्धि के लिए जापकी रक्षा करे ।६८। दशलक्षं जपेन्मन्त्रं दशांशं जुहुयात्ततः । पुण्डरीकैः पयोभ्यक्तैस्तिलैर्वा मधुराप्लुतैः ।६६ मातृकौदीरिते पीठे वागीशीमर्चयेत्सुधीः । वर्णाब्जेनासनं दद्यान्मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ।७० आदावङ्गानि संपूज्य पश्चाच्छक्तीरिमा यजेत् । योगा सत्या च विमला ज्ञाना बुद्धिः स्मृतिः पनः ।७१ मेधा प्रज्ञा च पत्रेषु मुद्रापुस्तकधारिणीः । दलाग्रेषु समभ्यर्च्य ब्राह्मयाद्यास्ता यथाविधि ।७२ लोकपाला बहिः पूज्यास्तेषामस्त्राणि तद्बहिः । एवं संपूजयेन्मन्त्री जपहोमादितत्परः ।७३ इस मन्त्र का दश लाख जप करे और जप का दशांश होम करना चाहिए। हवन दूध में अक्त कमलों से अथवा मधुर में आप्लुत तिलों से करें। सुधी पुरुष मातृका में उदीरि पीठ पर वागीशी का अर्चन करे, वर्णाब्ज से आसन देवे और मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे ।६६।७०। आदि में अंगों का पूजन करके पीछे इन शक्तियों का यजन करना चाहिए। योग, सत्या, विमला, ज्ञाना, बुद्धि, स्मृति, मेधा और प्रज्ञा का पत्रों में अर्चन करे। दलों के अग्र भागों में मुद्रा तथा पुस्तक को धारण करने वाली ब्राह्मणी आदिका विधि के साथ समभ्यर्चन करना चाहिये ।७१।७२। लोकपालों का यजन बाहिर करे तथा उनके