शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 156, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६ ] [ श्री शारदा तिलक आयुधों का अर्चन उनके बाहिर करना चाहिए। इस प्रकार से जप और होम आदि में परायण मन्त्रधारी भली-भाँति पूजन करे। ७३। ब्रह्मचर्यरतः शुद्धःशुद्धदन्तनखादिकः । संस्मरन्सर्ववनिताः सततं देवताधिया ।७४ कवित्वं लभते धीमान् मासैर्द्वादशभिर्ध्रुवम् । कृत्वा तन्मन्त्रितं तोयं सहस्रं प्रत्यहं पिबेत् ।७५ महाकविर्भवेन्मन्त्री वत्सरेण न संशयः । उरोमात्रे जले स्थित्वा ध्यायेन्मार्तण्डमण्डले ।७६ स्थितां देवीं प्रतिदिनं त्रिसहस्रं जपेन्मनुम् । लभते मण्डलात्सिद्धि वाचमप्रतिमां भुवि ।७७ पलाशबिल्वकुसुमैर्जुहुयान्धुरोक्षितैः । समिद्भिर्वा तदुत्थाभिर्यशः प्राप्नोति वाक्पतेः ।७८ ब्रह्मचर्य व्रत में रत और दाँत तथा नरखों को शुद्ध रखने वाला पुरुष निरन्तर सब वनिताओं का देवता की बुद्धि से निरन्तर स्मरण करता हुआ पुरुष बारह मासों में ही धीमान् होकर निश्चय ही कवित्व का लाभ किया करता है। इस मन्त्र से एक सहस्र बार अभिमन्त्रित करके जल को प्रतिदिन पान करे तो मन्त्रधारी एक ही वर्ष में महा- कवि हो जाया करता है—इसमें कुछ भी संशय नहीं है। वक्षःस्थल पर्यन्त जल में स्थित होकर मार्तण्ड मण्डल में स्थित देवी का ध्यान करे और नित्य ही तीन सहस्र मन्त्र का जप किया करे तो मण्डल से सिद्धि का लाभ करता है और भूमण्डल में अप्रतिम वाणी को प्राप्त कर लेता है ।७४।७५।७६।७७। पलाश-बिल्व के पुष्पों से मधुर में उक्षित करके अथवा उनसे ग्रहण की हुई समिधाओं से हवन करे तो वाणी के स्वामी के यश को प्राप्त कर लेता है ।७८। होमोऽयं सर्वसौभाग्यलक्ष्मीवश्यप्रदोभवेत् । राजवृक्षसमुद्भूतैः प्रसूनैर्मधुराप्लुतैः ।७६