शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम पटल । [ १६३ वागीशी पूजयेत्पीठे विधिना मातृकोदिते । प्राक् प्रस्तुतेन मार्गेण प्रत्यहं साधकोत्तमः ।१११ व्याघातकुसुमैर्हुत्वा वाक्सिद्धिमतुलां लभेत् । जाती पुष्पैः सिताम्भोजैः सिक्तैश्चन्दनवारिणा ।११२ नन्द्यावर्तैः शुभैः कुन्दैर्हुत्वा वाक्सिद्धिमाप्नुयात् । जपन् बीजत्रयं मन्त्री सभायां जयमाप्नुयात् ।११३ सितां वचां वा ब्राह्मी वा जप्त्वा खादेद्दिनागमे । मेधां काममवाप्नोति साधकोनात्र संशयः ।११४ एवमुक्तेषु मन्त्रेषु दीक्षितोयतमानसः । एवं यो भजते भक्तया स भवेद् मुक्तिभुक्तिभाक् ।११५ सुसितैर्गन्धकुसुमैः पूजा सारस्वते विधौ । दूर्वाबीजाङ्कुरं पुष्पं राजवृक्षसमुद्भवम् ।११६ उत्पलानि प्रशस्तानि सिन्दुवारांकुराणि च । भजेत्सरस्वतीं नित्यमेतानि परिवर्जयेत् ।११७ मातृका में कथित पीठ पर विधि से वागीशी का अर्चन करना चाहिए । साधकोत्तम को पूर्व से प्रस्तुत मार्गके ही द्वारा प्रतिदिन पूजन करे ।१११। व्याघात पुष्पों से होम करके अतुल वाक् सिद्धि की प्राप्ति करता है । जाती के पुष्पों-श्वेत कमलों को चन्दन के जल में सिक्त करके अथवा नन्द्यावर्त के शुभ पुष्पों से कुन्द पुष्पों से हवन करके वाक् सिद्धि को प्राप्त किया करता है । मन्त्रधारी तीनों बीजों का जप करता हुआ सभा में विजय प्राप्त करता है ।११२।११३। सित वचा अथवा ब्राह्मी बूटी, को अभिमन्त्रित करके दिन के आगम में खावे तो साधक पूर्ण मेधा को प्राप्ति किया करता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।११४ इस तरह से उक्त मन्त्रों में दीक्षित यत्तमानस जो ऐसा भक्ति से सेवन करता है वह भुक्ति और मुक्ति को प्राप्त करने वाला होता है ।११५। सारस्वत विधि में सुन्दर श्वेत गन्ध और पुष्पों से पूजा होती है । दूर्वा कुर, पुष्प, राजवृक्ष से समुद्भूत पुष्प और उत्पल तथा सिन्दु