शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१६२ ] [ श्री शारदा तिलक बहुना किमियं विद्या जपतां कामदामणिः । तोयस्थं शयनं विष्णोः सकेवलचतुर्मुखः ।१९०६ बिन्द्वर्धीशयुतो वह्निर्बिन्दुसद्योऽम्बुमाम भृगुः । उक्तानि त्रीणि बीजानि सद्भिः सारस्वताथिनाम् ।१०७ अङ्गानि कल्पयेद्बीजैर्द्विरुक्तैर्जातिसंयुतैः ।१०८ मुक्ताहारावदातां शिरसि शशिकलालङ्कृतां बाहुभिःस्वै व्याख्यां वर्णाक्षमालां मणिमयकलशं पुस्तकं चोद्वहन्ती । आपीनोत्तुङ्गवक्षोरुहभरविनमन्मध्यदेशामधीशां वाचा, मीडे चिराय त्रिभुवननमितां पुण्डरीके निषण्णाम् ।१९०६ त्रिलक्षं प्रजपेन्मत्रं जुहुयात्तद्दशांशतः । पायसेनाज्यसिक्तेन संस्कृते हव्यवाहने ।११० इस विद्या के विषय में अधिक क्या कहा जावे, इसके जप करने वालों को यह कामनाओं के देने वाली चिन्तामणि ही है। अब अन्य मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है--विष्णोः शयन-आकार, तोयस्थ- वकारस्थ, चतुर्मुख केवल स्वर रहित क्कार, अर्धीश-ऊ, वह्नि-रेफ से युक्त सम्-ओकार, अम्बु-वकार, भृगु-सः, ये सत्पुरुषों के द्वारा सारस्वत के अथियों के लिए तीन बीज कहे गये हैं ।१०६।१०७। दो वार कहे हुए जाति संयुक्त बीजों से अङ्गों की कल्पना करनी चाहिए ।१०८। ध्यान बताया जाता है-मोतियों के हार के समान अवदात अर्थात् श्वेत-शिर में चन्द्रमा की कला से विभूषित अपनी बाहुओं के द्वारा व्याख्या-वर्णों की अक्षमाला, मणिमय कलश और पुस्तक को वहन करती हुई-आपीन (स्थूल) और ऊँचे स्तनों के भार से विनम्र मध्य देश वाली तीनों भुवनों के द्वारा वन्दित, पुण्डरीक पर विराजमान वाणी की अधीशा का मैं स्तवन करता हूँ ।१०६। इस मन्त्र का तीन लाख जप करना चाहिए और जप का दशांश होम करे । होम संस्कार किए हुए अग्नि में आज्य से सिक्त पायस के द्वारा करना चाहिए ।११०।