शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टम पटल ] [ १६५ चाहिए ।१२०। जो स्त्री रजो धर्म में हो उसका गमन नहीं करे और सुन्दर नेत्रों वाली स्त्री की निन्दा नहीं करनी चाहिए । असत्य वचन कभी न बोले और सुधी पुरुष पुस्तक का अतिक्रमण नहीं करे ।१२१। जो भो पत्र अक्षरों युक्त हों उनकी उपेक्षा न करे तथा उनको लांघन भी नही चाहिए । चतुर्दशी, अष्टमी, पर्व दिन, प्रतिपदा, उग्र ग्रहण, सब संक्रमणों में द्विज विद्या न पढ़े । बुध पुरुष व्याख्यान में निन्दा का तथा जँभाई और आलस्य का त्याग कर देवे ।१२२।१२३। क्रोध, थूकना, नीच के अङ्ग का स्पर्श न करे । मनुष्य, सर्प, मार्जार, मेंढक और नकुल आदि यदि बीच में होकर जावें तो व्याख्या का परित्याग कर देना चाहिए ।१२४। निशा में दीप के बुझने पर पाठ का तुरन्त त्याग कर देवे । इन दोषों का ज्ञान प्राप्त कर भली भाँति भक्ति से जो भारती का यजन करता है वह दूसरे वाचस्पति के ही समान सिद्धि को प्राप्त किया करता है ।१२५।१२८। अष्टम पटल लक्ष्मी मन्त्र प्रकरण अथ वक्ष्ये श्रियो मन्त्रान् श्रीसौभाग्यफलप्रदान् । यस्याः कटाक्षमात्रेण त्रैलोक्यमपि वर्द्धते ।१ वान्तं वह्निसमारूढं वामनेत्रेन्दुसंयुतम् । बीजमेतत् श्रियः प्रोक्तं चिन्तामणिरिवापरः ।२ ऋषिर्भृगुर्निवृच्छन्दो देवता श्रीः समीरिता । षड्दीर्घयुक्तबीजेन कुर्यादङ्गानि षट्क्रमात् ।३ कान्त्या काञ्चनसन्निभाँ हिमगिरिप्रख्यैश्चतुर्भिर्गजै- हस्तोत्क्षिप्तहिरण्मयामृतघटैरासिच्यमानां श्रियम् ।