भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 17

श्री शारदा तिलक ] [ १३ रस और गन्ध भूतों के गुण होते हैं—ऐसा कहा गया है। २१। २२। दिव वृत्त है, उससे षड्विन्दुओ से लाञ्छित वायु है-यह स्वस्तिक से युक्त त्रिकोण है—वह्नि अर्ध चन्द्र से संयुक्त होता है। २३। भूमि के अम्भ से चतुरस्र वज्र सहित अम्भोज होता है। बुध गण उस भूत के समान आभा वाले मन्डलों को जानते हैं। २४। इनको अपने वर्णों से अञ्चित और अपने-अपने नामों से आकृत भी है। धरा आदि पाँच भूतों को निवृत्ति आदि कलाएं कही गयी हैं। २५। निवृत्तिः सुप्रतिष्ठा स्याद्विद्या शान्तिरनन्तरम् । शान्त्यतीतेति विज्ञेया नाददेहसमुद्भवाः ।२६ पञ्चभूतात्मकं सर्वं चराचरमिदं जगत् । अचरा बहुधा भिन्ना गिरिवृक्षादिभेदतः ।२७ चरास्तु त्रिविधाः प्रोक्ता स्वेदाण्डजजरायुजाः । स्वेदजाः क्रिमिकीटाद्या अण्डजाः पन्नगादयः ।२८ जरायुजा मनुष्याद्यास्तेषु नृणां निगद्यते । उद्भवः पुंस्त्रियोयोगात् (१) शुक्रशोणितसंयुतान् ।२६ बिन्दुरेको भवेद्गर्भमुभयात्म क्रमादसौ । रजोऽधिके भवेन्नारी भवेद्र्रेतोऽधिके पुमान् । ३० निवृत्ति-सुप्रतिष्ठा-विद्या-शान्ति-शान्त्यतीता ये नायदेह से समुद्भव वाली कलाएं जाननी चाहिये । २६। यह स्थावर-जङ्गम चराचर जगत् सम्पूर्ण पांचों भूतों के ही स्वरूप वाला है। अचर पर्वत और वृक्ष आदि के भेदोंसे बहुत प्रकारके भिन्न-भिन्न होते हैं। २७। चर अर्थात् जङ्गम तीन प्रकार के होते हैं-कुछ स्वेदज हैं कुछ अण्डज होते हैं-और कुछ जरायुज हुआ करते हैं । स्वेद अर्थात् पसीने से समुत्पन्न होने वाले कृमि और कीट आदि होते हैं। अण्डों से उत्पन्न होने वाले पन्नग आदि हैं। २८। जरायुज मनुष्य आदि हैं उनमें नर-नारी कहे जाया करते हैं । इनकी उत्पत्ति पुरुषों और स्त्रियोंके योगसे हुआ करती है, अर्थात् पुरुषके वीर्य और स्त्री के रज के संयोग होने से होती है । २६। वह एक बिन्दु क्रम

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 17, कुल 511 में से · BharatKosha