भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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१४ ] [ प्रथम पटल से उभय स्वरूप वाला गर्भ होता है । रज के अधिक हो जाने पर नारी की उत्पत्ति होती है और वीर्य के अधिक होने पर पुमान् होता है ॥३०॥ उभयोः समतायां तु नपुंसकमिति स्थितिः। पूर्वकर्मा नुरूपेण मोहपाशेन यन्त्रितः ।३१ कश्चिदात्मा तदा तस्मिन् जीवभावं प्रपद्यते । अथ मात्राहृतैरन्नपानाद्यैः पोषितः क्रमात् ।३२ दिनात् पक्षात् ततो मासात् वर्द्धते तत्वदेहवान् । दोषैर्दूष्यैः सुखं प्राप्तो व्यक्ति याति निजेन्द्रियैः ।३३ वातपित्तकफा दोषाः दूष्याः स्युः सप्त धातवः । त्वगसृङ् मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि तान्विदुः ।३४ ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वग् दृग्जिह्वानासिका विदुः । ज्ञानेन्द्रियार्थाश्शब्दाद्याः स्मृताः कर्मेन्द्रियाण्यपि ।३५ वाक्पाणिपादपाय्वन्धुसंज्ञान्याहुर्मनीषिणः । वचनानादानगतयो विसर्गानन्दसंयुताः ।३६ यदि रज और वीर्य दोनोंकी समता होती है अर्थात् दोनो ही परि- माण में समान होते हैं तो नपुंसक की उत्पत्ति हुआ करती है। जो पूर्व जन्म के किये हुए कर्मों के अनुसार मोह के पाश से यन्त्रित होकर ही जन्म का ग्रहण किया जाता है। ३१। कोई भी आत्मा उस समय में उसमें जीव के भाव को प्राप्त किया करता है। इसके अनन्तर मात्रा के द्वारा समाहृत अन्न-पानादि से क्रम से वह पोषित हुआ करता है। ३२। वह तत्व देहधारी दिन पक्ष-मास के क्रम से बड़ा हो जाया करता है। दोषों से दूष्य अपनी इन्द्रियों के द्वारा सुख को प्राप्त होकर व्यक्तित्व को प्राप्त हुआ करता है, अर्थात् प्रकट होता है। वात-पित्त- कफ में दोष दूष्य हैं। सात धातुएं होती हैं अर्थात् शरीरमें रहने वाली सात धातुएं कहलाती हैं । त्वचा-रुधिर-मांस-मेद-अस्थि-मज्जा और शुक्र ये सात धातुएं हैं ।३३-३४। ज्ञानेन्द्रियाँ-श्रोत्र-त्वचा-नेत्र-जिह्वा-