शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 176, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ ] [ श्री शारदा तिलक मालती मल्लिका जाती केतकी शतपत्रकैः । पारन्ती तुलसी नन्द्यावर्तेर्द मनकैरपि ।५७ सर्वर्तुं कुं सुमोपेतैर्नमद्द्भिरुपशोभितम् । मन्दमारुतसंभिन्नकुसुमामोदिदिङ्मुखम् ।५८ तस्य मध्ये सदोत्फुल्लैः कुमुदोत्पङ्कजैः । सौगन्धिकैश्च कह्लारर्नवं: कुवलयैरपि ।५६ हंसासारसाकारण्ड भ्रमरैश्चक्रनामभिः । अन्यैः कलकलारावैर्विहंगैरुपशोभितम् ।६० तहासरसि तन्मध्ये पुलिनेऽतिमनोहरे । परितः पारिजाताढ्यंमण्डपं मणिकुट्टिमम् ।६१ उद्यदादित्यसंकाश भास्वर शशि शीतलम् । चतुर्द्वारसमायुक्तं हेमप्राकारशोभितम् ।६२ रत्नोपक्लृप्तिसंशोभि कपाटाष्टकसंयुतम् । नवरत्नसमावलृप्त तुङ्गोतुरतोरणम् ।६३ मालती—मल्लिका—जाती—केतकी—शतपत्रक—पारन्ती— तुलसी-नन्द्यावर्त्त—दमनकों से तथा सब ऋतुओं में होने वाले कुसुमों से युक्त नीचेकी ओर झुके हुये होवें । इनसे उपशोभित होवें । ऐसा ध्यान हो—यही स्मरण करना चाहिए । मन्द वायु से विकसित हुए पुष्पों की गन्ध से युक्त जिसमें दिशाओं का मुख होवें ।५७।५८। उसके मध्य में सदा उत्फुल्ल कुमुद उत्पल और पंकज होवें तथा सौगन्तिक—कल्हार नव कुवलय होवें—इनसे उपशोभायमान होवें ।५६। अन्य कल-कल रव (ध्वनि) वाले पक्षियों वह शोभायमान है ! उनमें एक महान् सरोवर है जिसका पुलिन अतीव मनोहर है । दोनों ओर पारिजाति के वृक्ष हैं, उनसे संयुत एक मण्डप है जिसमें मणियों का फर्श लग रहा है ।६०।६१। वह उदोयमान सूर्य के समान है जो परम भास्कर है और चन्द्रमा के सदृश शीतल है । उसमें चार द्वार हैं तथा सुवर्ण की चार दिवारी से परम शोभित है ! वह रत्नों की उपकृति से शोभा