शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम पटल ] [ १८१ श्रीबीजस्योदिते पीठे महालक्ष्मीं प्रपूजयेत् । श्रीबीजेनासनं दद्यान्मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् ।६१ शोभित तिल के फूल की श्री पर विजय प्राप्त करने के लिए समु- द्यत सुन्दर नासिका से समन्वित ललाट की कांति के द्वारा पराभूत किये हुए, आधे सुधाकर की किरणों वाली, सान्द्र (घने) सौरभ से युक्त कस्तूरी के तिलक से चिन्हित, मत्त भौंरों की माला से शोभित दलसे संयुत मुख कमल वाली, पारिजात के पुष्पों की शोभा का वहन करने वाले धम्मिल के पुष्पों से बन्धन वाली—बेश कीमती रत्नों से सुघटित मुकुट से युक्त मस्तक से समन्वित, सब प्रकार के लावण्य के निवास स्थान-विभ्रम की श्री का भवन स्वरूप, तेजों के प्रभव का स्थान ऐसी परमाधिक मनो- हर महालक्ष्मी का ध्यान करे । इस प्रकार से उसी देवी का हृदय में चिन्तन करके हविष्य का अशन करने वाला तथा इन्द्रियों को जीतकर वश में रखने वाला होवे । बारह लाख मन्त्र का जप करे और जप का दशम भाग का घृत से हवन करना चाहिए । इसके अनन्तर प्रत्येक का श्री फलों से तथा पद्मों से दश हजार आहुतियाँ देवे । बीस हजार शुद्ध जल द्वारा जिसमें सुन्दर गन्ध हो तर्पण करना चाहिए । श्री बीज के उदित पीठ में महालक्ष्मी का पूजन करे । श्री बीज से आसन देना चाहिए तथा मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे ।८५।६१। पूजयेद्दक्षिणे पार्श्वे देव्याः शङ्करनन्दनम् । अन्यतः पुष्पधन्वानं पुष्पाञ्जलिकरं यजेत् ।६२ अङ्गानि पूर्वमुक्तेषु स्थानेषु विधिवद्यजेत् । उमाद्याः पत्रमध्यस्थाः शक्तीरष्टौ यजेत् क्रमात् ।६३ अथोमा श्रीसरस्वत्यौ दुर्गा धारिणिसंयुता । गायत्री देव्युषा चैवपद्महस्ताः सुभूषणाः ।६४ जह्नुसूर्यसुते पूज्ये पादप्रक्षालनोद्यते । शंखपद्मनिधी पूज्यौ पार्श्वयोर्धृतचामरा ।६५