भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 182

१८२ ] [ श्री शारदा तिलक धृतातपत्रं वरुणं पूजयेत्पश्चिमे ततः। संपूज्य राशीन्परितो यजेदथ नवग्रहान् ।६६ अर्चयेद्दिग्गजान् दिक्षु चतुर्दन्तविभूषितान्। ऐरावतः पुण्डरीको वामनः कुमुदोऽञ्जनः ।६७ पुष्पदन्तः सार्वभौमः सुप्रतीकश्च दिग्गजाः। अभ्यर्च्यदथेन्द्रादीन् तदस्त्राणि वहिर्यजेत् ।६८ देवी के दाहिने भाग में शंकर नन्दन (श्रीगणेश) का अभ्यर्थन करे। अन्य और पुष्पधन्वा (कामदेव) यजन करे जिनके कर में पुष्पांजलि होवे। उनके अङ्गों का पूर्व की भाँति पहिले कथित स्थानों में विधि के साथ यजन करना चाहिए। उमा आदि का जो पत्रों के मध्य में संस्थित हैं इन आठ शक्तियों का क्रम से अभ्यर्थन करे। इसका अनन्तर उमा, श्रीसरस्वती, दुर्गा-धरणी गायत्री देवी, उषा इनका यजन करे जो पद्म करों में लिए हुई हों और सुन्दर भूषणों से विभूषित होवें। जह्नु की सुता (गंगा) और सूर्य की सुता (यमुना) का पूजन करे जो पादों का प्रक्षालन करने के लिए समुद्यत होवे। दोनों पार्श्वभागों में चमर लिए हुए हों ऐसे पद्म निधि और शंख निधियों का यजन करे। पश्चिम में आतपत्र (छत्र) धारी वरुण का पूजन करना चाहिए। सब ओर राशियों का पूजन करके नव ग्रहों का यजन करे। दिशाओं में दिक्पालों गजों का पूजन करे जो चार दांतों से विभूषित होवें। उनके नाम हैं— ऐरावत पुण्डरीक वामन, कुमुद, अञ्जन, पुष्पदन्त, सार्वभौम, सुप्रतीक, ये दिग्गज होते हैं। इसके अनन्तर इन्द्रादिक का यजन करे और उनके अस्त्रों का बाहिर की ओर पूजन करना चाहिए।६२।६८। आगमोक्ते विधिना सुगन्धैः सुमनोहरैः। पूजयेद्गन्धपुष्पाद्यैर्देवींमन्वहमादरात् ।६९ दूर्वाभिराज्यसिक्ताभिर्जुहुयादायषे नरः। दशरात्रं समिद्धेऽग्नौ अष्टोत्तरसहस्रकम् । १००