भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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षष्ठम पटल ] [ १८३ गडूचीराज्यसंसिक्ता जुहुयात्सप्तवासरम् । अष्टोत्तरसहस्रं यः स जीवेच्छरदां शतम् ।१०१ हुत्वा तिलान् घृताभ्यक्तान्दीर्घमायुरवाप्नुयात् । आरभ्यार्कदिने मन्त्री दशरात्रे दिनेदिने ।१०२ आज्याक्तार्कसमिद्धोमादारोग्य लभते ध्रुवम् । कण्ठमात्रोदके स्थित्वा ध्यात्वा देवी दिवाकरे ।१०३ ऊर्ध्वबाहुर्दशशतमष्टोत्तरमिमं हुनेत् । आरोग्यं लभते सद्यो वाञ्छितान्यपि मन्त्रवित् ।१०४ शालीभिर्जुह्वतो नित्यमष्टोत्तरसहस्रम् । अचिरादेव महती लक्ष्मीः संजायते ध्रुवम् ।१०५ आगम में वर्णित विधि से सुगन्धित और सुमनोहर गन्ध पुष्प आदि उपचारों के द्वारा बड़े आदर से प्रतिदिन देवी का अभ्यर्चन करना चाहिए ।६६। घृत से अक्त दूर्वाओं से मनुष्य को आयु के लिए हवन करना चाहिए । दश रात्रि में समिद्ध अग्नि में एक हजार आठ आहु- तियां घृत से अक्त गुडची (गुलोय) से देवे जो सात दिन तक देनी चाहिए । जो पुरुष एक सहस्र आठ आहुतियाँ देता है । वह सौ वर्ष तक जीवित रहता है ।१००।१०१। घृत से अभ्यक्त तिलों का हवन करके मनुष्य दीर्घ आयु को प्राप्त किया करता है । रविवार से आरम्भ करके मन्त्रधारी व्यक्ति प्रतिदिन दश रात्रि पर्य्यन्त आक की समिधा के होम करने से निश्चय ही आरोग्य का लाभ किया करता है । कण्ठ पर्य्यन्त जल में स्थित होकर सूर्य देवी का ध्यान करे और अपनी बाहुओं को ऊपर की ओर कर लेवे और फिर एक सहस्र आठ बार इसका हवन करे तो मन्त्र का ज्ञाता व्यक्ति तुरन्त ही आरोग्य का लाभ करता है । और जो भी मनोवांछित होते हैं उनकी भी प्राप्त किया करता है। जो शालि चावलों के द्वारा अष्टोत्तर सहस्र का नित्य हवन करता है उसको अविलम्ब ही महती (बहुत बड़ी) लक्ष्मी का निश्चय ही लाभ होता है ।१०२।१०५।