शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 191, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम पटल ] [ १६१ दलमूलेषु सम्पूज्य पत्रमध्येषु संयजेत् । भारतीं पार्वतीं चान्द्रीं शचीं च दमकादिकान् । १५२ दलार्द्धेष्वर्चयेद्वाणान् महालक्ष्म्याः क्रमादमून् । अनुरागं च संवादं विजयं वल्लभं मदम् । १५३ हर्ष बलं च तेजश्च लोकनाथाननन्तरम् । तदायुधानि तद्वाह्ये पूजयेत्साधकोत्तमः । १५४ अब ध्यान बताया जाता है—सिन्दूर के तुल्य अरुण कान्तियुत, कमल में निवास करने वाली, सुन्दरता की महासागर, मुकुट, अङ्गद, हार, कुण्डल, कटि सूत्र आदि से विभूषित, हस्त कमलों द्वारा आठ दलों वाले दो कमल और आदर्श धारण किये हुए हैं, निरन्तर परि- चारिकाओं से आवीत है, ऐसी परादेवी भगवान विष्णु की प्रिया का ध्यान करना चाहिए । इस मन्त्र का एक लाख जप करे और मधुरों से उक्षित बेल के फलों से हवन करे । जप का दशांश संस्कार की हुई अग्नि में होम करना चाहिए । हवन की विधि जो पहिले कही गयी है वही होवे । उसका अर्चन श्री बीजोक्त पीठ पर करे । क्रम यह है कि कर्णिका में अङ्गों का पूजन करे फिर श्रीधर आदि मूर्त्तियों का यजन करे । श्रीधर, हृषीकेश, वैकुण्ठ, विश्वरूपक, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध का दलों के भूतों में पूजन करके दलों के मध्य में पार्वती, चान्द्री, शची का भली-भाँति यजन करे । फिर महालक्ष्मी के दमकादि वाणों का दलों के अर्ध भाग में क्रम से यजन करना चाहिए । अनुराग, संवाद, विजय, वल्लभ, मद, हर्ष, बल ओर तेज ये वाण हैं । इसके अनन्तर लोकनाथों का पूजन करे । उसके बाहिर साधक को उनके अस्त्रों का पूजन करना चाहिए । १५८। १५४। अनेन विधिना देवीं महालक्ष्मीमुपासते । ये तेषु निवसेल्लक्ष्मीरस्मरन्तीनिजालयम् । १५५