शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१६२ ] [ श्री शारदा तिलक उत्पलैर्जुहुयाल्लक्षं चन्दनाम्भसि लोलितैः । शत्रूणां लभते राज्यं विना युद्धेन पार्थिवः ।१५६ जपन् राजसभां गच्छेत्सम्भाव्येत तथा नरः । दूर्वा देवी महालक्ष्मीर्विष्णुक्रान्ता मधुव्रता ।१५७ मुसली शक्रावल्ली च सदामद्राञ्जलिप्रिया । हरिचन्दनकर्पूरचन्दनाङ्कोलरोचनाः ।१५८ मालूरकेसरौ कुष्ठं सर्वं पिष्ट्वा निशारसः । अष्टोत्तरसहस्रं तु जपित्वा तिलकक्रियाम् ।१५६ कुर्वतो मन्त्रिणः सर्वे वशास्तिष्ठन्त्यहर्निशम् । श्रियोमन्त्रं जपेन्मन्त्री श्रीसूक्तान्यपि संजपेत् ।१६० भूयसीं श्रियमाकाङ्क्षन् सत्यवादी भवेत्सदा । प्रत्यागाशामुखोऽश्नीयात्स्मितपूर्वं प्रियं वदेत् ।१६१ जो इस विधि से देवी महालक्ष्मी की उपासना किया करते हैं उनके गृहों में वह अपने निवास स्थान का स्मरण करती हुई निवास किया करती है । चन्दन के जल में लोलित किए हुए उत्पलों से नित्य ही हवन करे । आहुतियों की संख्या एक लाख होनी चाहिए । इससे राजा युद्ध के बिना ही शत्रुओं के राज्यको प्राप्त कर लिया करता है । इसका जप करता हुआ राजसभा में गमन करे तो मनुष्य प्रतिष्ठा प्राप्त किया करता है । दूर्वा, देवी, महालक्ष्मी, विष्णुक्रान्ता, मधुव्रता, मुशली, शक्रवल्ली, सदामद्रा, अञ्जलि प्रिया, हरि चन्दन, कपूर, चन्दन, अंकोल, रोचना, माजूर, केशर, कुष्ठ, इन सबको निशा (हल्दी) के रस के साथ पीसकर एक सहस्र आठ वार जप करके तिलक की क्रिया को करने वाले नृप के सब मन्त्रीगण रात-दिन वश में स्थित रहा करते हैं । श्री के मन्त्र का जप करते हुए मन्त्रधारी श्री सूक्त का भी भली-भाँति जप करे । बहुत अधिक श्री की आकांक्षा रखता हुआ सदा सत्य बोलने वाला होना चाहिए । प्रत्येक दिशा की ओर मुख वाला