शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६४ ] [ श्री शारदा तिलक नवम पटल भुवनेश्वरी प्रकरण अथ वक्ष्ये जगद्धात्रीमधुना भुवनेश्वरीम् । ब्रह्मादयोऽपि यां ज्ञात्वा लेभिरे श्रियसूर्जिताम् ।१ लकुलीभोगिनमारूढो वामनेत्राद्धं चन्द्रवान् । बीजं तस्याः समाख्यातं मेवितं सिद्धिकाङ्क्षिभिः ।२ ऋषिः शक्तिर्भवेच्छन्दो गायत्री देवता मनोः । कथिता सुनसङ्घेन सेविता भुवनेश्वरी ।३ षड्दीर्घयुक्तबीजेन कुर्यादङ्गानि षट् क्रमात् । संहारसृष्टिमार्गेण मातृकान्यस्तविग्रहः ।४ मन्त्रन्यासं ततः कुर्याद्देवताभावसिद्धये । हृल्लेखां मूर्द्धिन वदने गगनं हृदयाम्बुजे ।५ रक्तां करालिकां गुह्ये महोच्छुष्मा पदद्वये । ऊर्ध्वप्रागदक्षिणोदीच्यपश्चिमेषु मुखेषु च ।६ सद्यादिह्रस्वबीजाद्या न्यस्तव्या भूतसप्रभा । अङ्गानि विन्यसेत्पश्चाज्जातियुक्तानि षट्क्रमात् ।७ इसके अनन्तर इस समय में जगत् की धात्री भुवनेश्वरी के विषय में बतलाऊँगा । जिसका ज्ञान प्राप्त करके ब्रह्मा आदि देवगण भी परम अर्जित श्री को प्राप्त किया करते हैं ।१। हकार, रकार, ईकार और विन्दु इस प्रकार से मिलकर [एक बीज होता है । सिद्धि की इच्छा वालों का सेव्य उसका बीज कहा गया है । ऋषि वसिष्ठ का सुत शक्ति है गायत्री छंद है मन्त्र का देवता सुरों के समुदाय के द्वारा सेवित भुव- नेश्वरी कही गई है ।२-३। छै से युक्त बीज द्वारा क्रम से छै अङ्गों को