शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम पटल ] [ १६५ करे। संहार-सृष्टि के मार्ग के द्वारा मातृका न्यास के विग्रह वाला होवे।४। फिर देवता के भाव की सिद्धि के लिए मंत्र न्यास करना चाहिए। हृल्लेखाना मूर्धा में—मुख में गगन का - हृदनाम्बुज में रक्त का—गुह्य में करालिका का—और महोच्छुष्मा का दोनों पदों में न्यास करे। ऊर्ध्व में, पूर्व में, दक्षिण में, उत्तर में, पश्चिम में, मुखों में सद्यादि ह्रस्व बीज युक्त भूतसप्रभाओं का न्यास करना चाहिए। पीछे षट्क्रम से जाति युक्त अङ्गों का न्यास करे ।५-७। ब्रह्मांगं विन्यसेद्भाले गायत्र्या सह संयुतम् । सावित्र्या संयुतं विष्णुं कपोले दक्षिणे न्यसेत् ।८ वागीश्वर्या समायुक्तं वातगण्डे महेश्वरम् । श्रिया धनपतिं न्यस्येत् वामकर्णाग्रके पुनः ।६ रत्या स्मरं मुखे न्यस्य पुष्ट्या गणपतिं न्यसेत् । सव्यकर्णोपरि निधी कर्णगण्डान्तरालयोः ।१० न्यस्तव्याै, वदने मूलं भूयश्चैतास्तनौ न्यसेत् । कर्णमूले स्तनद्वन्द्वे वामांसे हृदयाम्बुजे ।११ सव्यांस पार्श्व युगले नाभिदेशे च देशिकः । भालांसपार्श्वजठरपार्श्वा सापरके हृदि ।१२ ब्रह्मा याद्यास्ततोन्वस्या विधिना प्रोक्तलक्षणाः । मूलेन व्यापकं देहे न्यस्य देवीं विचिन्तयेत् ।१३ उद्यद्दिनद्युतिमिन्दुकीरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम् । स्मरेमुखीं वरवाडकपाशाभींतिकरां प्रजजेद्भुवनेश्वरीम् ।१४ गायत्री के साथ संयुत ब्रह्माजी का भाल में न्यास करे। दक्षिण कपोल में सावित्री से संयुत भगवान् विष्णु का न्यास करना चाहिए। वागीश्वरी से संयुत भगवान् महेश्वर का वामगण्ड में न्यास करे। फिर श्री से समायुक्त धनपतिका वामकर्ण के अग्रभाग में न्यास करे ।८-६। रति से समन्वित कामदेव का मुख में न्यास करके पुष्टि से संयुत गण- पति का न्यास सव्यकर्ण के ऊपर करना चाहिए। कर्णों और गण्डों के