शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०६ ] [ श्री शारदा तिलक राजवृक्ष के पुष्पों से, जो चंदन के जल में समुक्षित करके हवन करे तो बहुत ही शीघ्र तीनों लोकों को अपने वश में कर लेता है। मधुर से प्लुत अरुण कमलों के द्वारा दश हजार आहुतियाँ देवें तथा तिलों के सहित तण्डुलों से हवन करे तो साधना करने वाला पुरुष राज्यश्री को प्राप्त कर लेता है। पूर्व में वर्णित कर्मों का भी इसी मन्त्र के द्वारा साधन करना चाहिए ।६६-६८। वाग्बीज से सम्पुटित माया—यह तीन अक्षरों वाली विद्या हैं। मध्य में दीर्घ संयुक्त वाक्पुट से कल्पित करे। मन्त्र का ज्ञान रखने वाला पुरुष क्रम से जातियुक्त अङ्गों का जिस तरह से पूर्व में समुद्दिष्ट किये हैं न्यासों को करे। तात्पर्य यह है पूर्वोक्त रीति से ही अङ्गन्यास करना चाहिए ।६९-७०। श्यामांगी शशिशेखरां निजकरैर्दानं च रक्तोत्पलं रत्नाढ्यं चषकं वरम्भयहरं संविभ्रतीं शाश्वतीम्। मुक्ताहारलसत्पयोधरनतां नेत्रत्रयोल्लासिनीं। वन्देऽहं सुरपूजितां हरवधू रक्तारविन्दस्थिताम् ।७१ तत्तत्त्वक्षं जपेन्मन्त्र जुहुयात्तद्दशांशतः। पलाशपुष्पैः स्वादक्तैः पुष्पैर्वा राजवृक्षजैः ।७२ हृल्लेखाविहिते पीठे पूजयेत्परमेश्वरीम्। मध्यादि पूजयेन्मन्त्री हृल्लेखाद्याः पुरोदिताः ७३ मिथुनानि यजेन्मन्त्री षट्कोणेषु यथा पुरा। अंगपूजा केशरेषु पूज्याः पत्रेषु मातरः ।७४ भैरवाङ्कसमारूढाः स्मरेवक्रा मदालसाः। असितांगोरुरुश्चण्डः क्रोध उन्मत्तभैरवः ।७५ कपाली भीषणश्चैव संहारश्चाष्ट भैरवाः। शूलं कपालं प्रेतं च विभ्राणाः क्षुद्रन्दुभिम् ।७६ गजत्वगम्बरा भीमाः कुटिलालकशोभिताः। दीर्घाद्यां मातरः प्रोक्ता ह्रस्वाद्या भैरवाः स्मृताः ।७७