शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम पटल ] [ २०६ दधिक्षौद्रघृताक्ताभिः समिद्भिः क्षीरभूरुहाम् । तत्संख्यया तिलैः शुद्धैः पयोक्तैजुहुयात्ततः।८६ हृल्लेखाविहिते पीठे नवशक्तिसमन्विते । अर्चयेत्परमेशानी वक्ष्यमाणक्रमेण ताम् ।८७ हृल्लेखाद्या यजेदादौ कर्णिकायां यथाविधि । अङ्गानि केसरेषु स्युः पत्रस्था मातरः क्रमात् ।८८ इन्द्रादयः पुनः पूज्यास्तेषामस्त्राणि तद्बहिः । एवं संपूजयेद्देवीं साक्षाद्वैश्रवणो भवेत् ।८६ दृश्यते मकलैर्लोकैस्तेजसा भास्करोपमः । अनेनाधिष्ठतं गेह निशि दीपशिखाकुलम् ।६० दृश्यते प्राणिभिः सर्वैर्मन्त्रस्यास्य प्रभावतः । सर्षपैर्लोगसंमिश्रैराज्यक्तैर्जुहुयान्निशि ।६१ अपनी सब इन्द्रियों को जीत लेने वाला हविष्य का भोजन करने वाला पुरुष यन्त्र का चौबीस लाख जप करे । मन्त्रोंका ज्ञान रखने वाला जप के अन्त में उतना ही सहस्र होम करे । फिर दही, शहद और घृत से अक्त करके दूध वाले वृक्षों की समिधाओं से उसकी संख्या से शुद्ध तिलों के द्वारा जो पय से अक्त होवें हवन करना चाहिए और उसकी संख्याके ही अनुसार होम करे ।८५।८६। उस परमेशानी का आगे बताये जाने वाले क्रम से नव शक्तियों से समन्वित हृल्लेखाविहित पीठ पर अभ्यर्चन करना चाहिए ।८७। आदि में विधि के अनुसार कर्णिका में हृल्लेखा आदि का यजन करे । केसरों में अङ्ग होवें और मातृगण क्रमसे पत्रों में स्थित होनी चाहिए ।८८। फिर इन्द्र आदि का पूजन करे और उनके बाहिर उनके अस्त्रों का यजन करे । इस प्रकार से देवी का अर्चन करे तो साक्षात् वैश्रवण ही हो जाया करता है ।८६। वह मनुष्य तेजसे समस्त लोकों के द्वारा सूर्यके ही तुल्य दिखलाई दिया करता है । इसके द्वारा अधिष्ठित गेह रात्रि में दीप शिखा से समाकुल होता है ।६०। इस मन्त्र के प्रभाव से सभी प्राणियों के द्वारा वह ऐसा दिखलाई दिया