शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्री शारदा तिलक ] १७ अगाध हैं। भूख और पिपासा प्राण के-शोक और मोहमन के-जरा और मृत्यु शरीर की-ये छँ ऊर्मियाँ कही गयी हैं । स्नायु-मज्जा और अस्थि शुक्रसे त्वक्-मांस शोणित से-वह देहधारियोंके देहों में षाट्कौशिककहा गया है । इस प्रकारसे स्थित यह गर्भमें आता है और उस समयमेंअपने पूर्व जन्म में किये हुए शुभ-अशुभ कर्मों का स्मरण करता है । यह बहुत ही दुःखित रहतेहुये स्थित रहता है, इसकासब शरीर जरायुसे ढकाहुआ होता है । काल स क्रमसे वह शिशु अपनी माता को क्लेशित करताहुआ भी गर्भ में रहता है । उसका शरीर पिण्डित रहता है और वह नीचेकी ओर मुख वाला जन्म लिया करता है । क्षण में ही यह विस्मृति वाला- निश्चेष्ठ होता हुआ अपने रुदन करनेकी इच्छा किया करता है।६ ५०। ततश्चैतन्यरूपा सा सर्वगा विश्वरूपिणी । शिवसन्निधिमासाद्य नित्यानन्दगुणोदया ॥५१ दिक्कालाद्यनवच्छिन्ना सर्वदेहानु (वेदार्थ) गा शुभा । परापरविभागेन पराशक्तिरियं स्मृता ॥५२ योगिनां हृदयाऽम्भोजे नृत्यन्ती नित्यमञ्जुला । आधारे सर्वभूतानां स्फुरन्ती विद्युदाकृति ॥५३ शंखवर्त्तक्रमाद्देवी सर्वमावृत्य तिष्ठति । कुण्डलीभूतसर्पाणामङ्गश्रियमुपेयुषी ॥५४ सर्वदेवमयी देवी सर्वमन्त्र (वर्ण) मयी शिवा । सर्वतत्त्वमयी साक्षात् सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरा विभुः ॥५५ इसके अनन्तर वह चैतन्यरूप वाली-सबमें स्थित-विश्व रूपिणी- शिव के सान्निध्य को प्राप्त करके नित्यानन्द गुणों के उदययुता-दिशा और काल आदि से अनवच्छिन्ना-सबके देहों में अनुगमन करने वाली शुभा पर और अपर के विभागसे यह पराशक्ति कहीं गयी है ।५१-५२। योगियों के हृदय कमल में नित्य ही सहसा नृत्य करती हुई-समस्त प्राणियों के आधार में विद्युत की आकृति वाली यह स्फुरण करती हुई ।५३। शंख के आवर्त के क्रम से यह देवी सबकी आवृत्त करके स्थित रहा करती है । यह कुण्डलीभूत सर्पों की अङ्गश्री को प्राप्त होने