भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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दशम पटल ] [ २२१ करती हुई, तीन नेत्रों से युक्त, कर-कमलों के द्वारा शङ्ख, कृपाण, त्रिशिख को धारण करने वाली, सिंह के स्कन्ध पर अधिरूढ़, अपने तेज के द्वारा सम्पूर्ण त्रिभुवन को पूरित करने वाली, देवगणों से परि- वृत, सिद्ध कामों के द्वारा सेवित, जय नाम वाली दुर्गा का ध्यान करे ।३७। पाँच लाख मन्त्र का जप करे फिर घृत से होम करे। हवन संस्कार की हुई अग्नि में दशांश करना चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन करावे ।३८। सुधी पुरुष को चाहिए कि पूर्व की ही भाँति अष्टाक्षरोपित पीठ पर पूजन करे। मन्त्र का जप करते हुए युद्ध में प्रवेश करे तो विशेष रूप से शत्रुओं का हनन किया करता है ।३९। व्यवहार आदि प्रकृष्ट रूप से जप करे तो वहाँ पर भी विजय होता है ! इस विद्या के द्वारा जप का अर्थी अस्त्रों और शस्त्रों का अर्चन करे ।४०। ज्वल-ज्वल पदों के अन्त में शूलिनि—इस पद को कहे। दुष्टग्रह हैं—इस अस्त्र के अन्त वाला अन्त में स्वाहा होता है ।४१। भूतेन्द्रियाक्षरों के द्वारा कहा हुआ मन्त्र ग्रह-क्षुद्र शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसका ऋषि दीर्घतमा कहा गया है और इसका ककुप छन्द कहा गया है ।४२। शूलिनि देवता प्रोक्ता समस्तसुरवन्दिता । दुर्गे हृदवरदे शीर्ष विन्ध्यवासिनि तच्छिखा ।४३ वर्म्माऽसुरान्ते मर्द्दिनी युद्धपूर्वप्रिये पुनः । त्रासयद्वितयञ्चास्त्रं देवसिद्धसुपूजिते ।४४ नन्दिनी स्याद्रक्षयुगं महायोगेश्वरि क्रमात् । शूलिन्याद्या हुंफडन्ताः पञ्चांगमनवः स्मृताः ।४५ अध्यारूढां मृगेन्द्रं सजलजलधरश्यामलां हस्तपद्मैः शूलं वाणं कृपाणमरिजलजगदाचापपाशान्वहन्तीम् । चन्द्रोत्तंसा त्रिनेत्रां चतसृभिरसिना खेटकान् विभ्रतीभिः कन्याभिः सेव्यमानां प्रतिभटभयदां शूलिनि भावयामि ।४६