भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 222

२२२ ] [ श्री शारदा तिलक मन्त्रमेनं जपेन्मन्त्री वर्णलक्षं विचक्षणः। सर्पिषान्नेन होमस्तु दशांशमितो भवेत् ।४७ प्रागुक्तं पूजयेत्पीठे वक्ष्यमाणेन वर्त्मना। विधाय पूजामंगानां पूज्याः पत्रेषु शक्तयः ।४८ दुर्गाद्या वरदाविन्ध्यवासिन्यसुरमर्दिनी। युद्धप्रिया पञ्चमी स्याद्देवसिद्धसुपूजिता ।४६ समस्त सुरगणों द्वारा वन्दित शूलिनि देवता बतायी गयी है। दुर्गे हृदय है—वरदे शीर्ष है और विन्ध्यावासिनी उसकी शिखा है-असुरान्ते और फिर मर्दिनि युद्ध पूर्व प्रिये—वर्म है। युद्ध प्रिये त्रासयत् द्वितीय अस्त्र है—देवसिद्ध सुपूजिते रक्ष युग, महायोगेश्वरि क्रम से नन्दिनी है। शूलिनी आदि में और हुँफट् अंत वाले—ये पांच अंग मन्त्र कहे गये हैं। ४३।४४।४५। ध्यान—मृगेन्द्र पर समारूढ़, जल से परिपूर्ण मेघ के समान श्याम वर्ण वाली—कर कमलोंके द्वारा शूल, वाण, कृपाण, जलज, गदा, चाप और पाश को वहन करती हुई, चन्द्र के उत्तंस वाली, तीन नेत्रों से संयुत, असि से युत खेटकों को धारण करती हुई चोर कन्याओं के द्वारा सेवित, प्रतिभटों को भय देने वाली शूलिनि की भावना करता हूँ ।४६। विचक्षण पुरुष को चाहिए कि इस मन्त्र का वर्णलक्ष जप करे अर्थात् मन्त्र में जितने वर्ण होवे उतने ही लाख जप करना चाहिए । उस जप का दशांश सर्पिष के सहित अन्न से हवन करे ।४७। आगे बताये जाने वाले मार्ग से पूर्व कहे हुए पीठ पर यजन करे । अङ्गों की पूजा करके पत्रों में शक्तियों की पूजा करनी चाहिए ।४८। आद्या दुर्गा है वरदा विन्ध्यवासिनी, असुर मर्दिनी, पाँचवी युद्ध प्रिया, देवसिद्ध सुपूजिता ।४६। सप्तमी नन्दिनी प्रोक्ता महायोगेश्वरी परा । दलाग्रेषु तदस्त्राणि शङ्खचक्रमसिं पुनः ।५० गदेषुचापशूलानि पाशं पश्चाद्दिदशाधिपान् । इत्थं जपादिभिः सिद्धः कुर्यात्कर्मनिजेप्सितम् ।५१