शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें२४८ ] [ श्रीशारदा तिलक खगीश, व, पावक रेफ, हृल्लेखा, इसके बीज पीछे 'वरदान्ते' बोले सर्व लोक में वश मानव इसको बोलकर दो ठकार कहे । यह छब्बीस अक्षरों का मन्त्र है। इसके करने वालों के लिए यह कल्पवृक्ष ही है ।६७। ६८। गणक इसका ऋषि है गायत्र छन्द है और मन्त्र का देवता विरि विघ्नेश्वर है । यह सेवन करने वालों के मनोरथों को पूर्ण करने के लिए साक्षात् कल्पवृक्ष के ही समान होता है ।५६। अब षडङ्ग बतलाते हैं- अन्तःकरण चार-वेद-चार, इषु-पांच, भूत-पाँच, लोचन-दो द्वितीय का षट् पदों से षडङ्ग है। तृतीय का महागणपति के ही समान होता है। इस प्रकार से विभक्त मन्त्र के वर्णों से मायादि के द्वारा अङ्ग कल्पना होती है। महा-गणपति के स्थान के प्रोक्त होने पर मन्त्रधारी पुरुष विशेष चिन्तन अर्थात् ध्यान करे ।९०। सिन्दूराभनिभाननं त्रिनयनं हस्तेषु पाशाङ्कुशौ विभ्राणं मधुमत्कपालमनिशं साद्र्धेन्दुमौलि भजेत् । पुष्ट्याश्लिष्टतनुं ध्वजाग्रकरया पद्मोल्लसद्धस्तया । तद्योन्याहितपाणिमात्तवसुसत्पात्रोल्लसत्पुष्करम् ॥९१ चतुर्र्लक्षं जपेन्मंत्रं तद्दशांशं हुतक्रिया। प्राक्प्रोक्तै रष्टभिर्द्रव्यैस्मिध्वक्तैः समीरिता ।७२ पूर्वोक्ते पूजयेत्पीठे तीव्रादिनवशक्तिके । मूलेन मूर्तिं तसंकल्प्य तत्रावाह्यार्चयेद्विभुम् ।७३ मिथुनावृत्तिराद्या स्यादामोदाद्यै र्दिगम्बरैः । द्वितीयाङ्गै तृतीया स्याच्चतुर्थी मातृभिः स्मृता ।७४ पञ्चमी लोकपालैः स्यात्षष्ठी वज्रादिभिः स्मृता । इति सिद्धमनुं श्री प्रफुल्लैः सरसीरुहैः ।७५ जुहुयाद्गणगौरौ सर्वै तण्डुलैस्तिलमिश्रितैः । हुत्वा श्रियमाप्नोति मोदकैराज्यलोलितै ।७६ हुत्वा विजयमाप्नोति पार्थिवोयुद्धभूमिषु । मधुत्रयेण हवन वश नयति पार्थिवान् ।७७