शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 245, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादश पटल ] [ २४७ उक्तं महागणपतेर्विधानं सुरपूजितम् । सर्वसिद्धिकर पुसां सतस्तपुरुषार्थदम् ।६६ मायाविरपदद्वंद्व ततो गणपतिं वदेत् । खड्गीशपावकौ पश्चाद्वरदान्ते वदेत्पुनः ।६७ सर्वलोकं मे पदान्ते वशमानय ठद्वयम् । षड्विंशत्यक्षरोमन्त्रो भजतां सुरपादपः ।६८ गणकः स्यादृषश्छन्दो गायत्रं देवता मनोः । विरिवघ्नेश्वरः प्रोक्ता भजतां सुरपादपः ।६६ अन्तः करणवेदेषु भूतपञ्चविलोचनैः । एवं विभक्तै र्मन्त्रार्णै र्मायाद्यैरं गकल्पना । महागणपतेः प्रोक्तं स्थाने मन्त्री विचिन्तयेत् ।७० मांस, लकार, स्मृतिस्थ, गकारस्थ, ओरूप और विन्दु यह भू बीज कहा गया है । मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है-आठ दलों वाले कमल में षट्कोण के मध्य में शोभित त्रिकोण में प्रणव में स्थित गणपति के ग-इस बीज को लिखना चाहिए । त्रिकोण से बाहिर दिशाओं में षट् कोणों में बीजों के षट्कको लिखे । माया-लक्ष्मी-कन्दर्भ भूमिको लिखे । उनकी सन्धियों में अङ्ग मन्त्रों को लिखकर शिष्ट पतों में विद्वान् मूलमंत्र में स्थिति वर्णों का लेखन करे । अन्त्य वर्ण को आठवें दल में एक ही को लिखे । इसको त्रिगुणित करे । पत्रमें लिपियों से भावीत करे । क्रमोत्क्रम वशों से पाशांकुशों से भी भूगृह हृदय में वेष्टित यह गणाधीश का यन्त्र है । लाख, कुंकुम, रोचना और मृगमद से भोजपत्र पर अथवा हेम पर भली भाँति लिखकर अभिवहन करने से समस्तों के द्वारा सप्रार्थनीय श्री का लाभ किया करता है ।६३-६५। यह महागणपति का विधान सुरों के द्वारा पूजित कहा गया है । वह पुरुषों को सब सिद्धियों के वर देने वाला और समस्त पुरु- षार्थों का प्रदाता होता है ।६६। जब विरि गणपति के मन्त्र को बत- लाते हैं-दो बार मायाविरि पद को कहकर फिर गणपति कहे,