भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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२४६ ] [ श्रीशारदा तिलक नामादिबीजसहितौ तर्पयेत् स्वप्रियान्वितौ । तर्पणेनामुना स्वीयमिष्ट्याप्नोति मण्डलात् ॥६२ पाकड़ और वट की उत्पन्न समिधाओ के द्वारा शूद्रो को मंत्रधारी वश्य कर लेता है । मधु से होम करने पर स्वर्ण का लाभ होता है और गाय के दूध से होम करने पर गोओ का लाभ होता है ।५७। आज्य के होम से मानव बहुत बड़ी श्री की प्राप्ति किया करता है । दधि के होम से सम्पूर्ण समृद्धि होती है और अन्नों के द्वारा होम से अन्नपति होजाय करता है ।५८। जो वृष्टि की कामना वाला हो उसे वेतसो को श्रेष्ठ समिधाओं से हवन करना चाहिए । कुसुम्भ के कुसुमो से हवन करके शीघ्र ही वस्त्रों का लाभ प्राप्त करता है ।५८। आदि में मूल मन्त्र के द्वारा प्रत्येक का चार बार तर्पण करना चाहिए । श्री शक्ति, रति, भू लक्ष्मी जिनके आदि में बीज होवे और प्रिय से समन्वित होवें, अपने बीजों को आदि से रखने वाले तथा शक्ति से युक्त आमोद आदि का तर्पण करे । मन्त्रधारी पृथक्-पृथक् चार-चार बार तर्पण करे । तथा शंख निधि और पद्म निधिका अपनी प्रियाओ से सयुक्त नामादि बीज सहित का तर्पण करे । इस तर्पण के करने से मन्डल से अपने अभीष्ट को प्राप्त करता है ।६०-६२। स्मृतिस्थं मांसमौबिन्दुयुक्तं भूबीजमीरितम् ।६३ बीजं षट्कोणमध्ये स्फुरदनलपुरे तारङ्ग दिक्षु लक्ष्मीं । मा-कन्दर्पभूमीस्तदनुरसपुटेष्वारिखेद्वीजषट्कम् । तत्सन्धिष्वअंगमन्त्रान्वसुदलकमले मूलमन्त्रस्थवर्णान् शिष्टान्पत्रेषु विद्वान्विलिखतु गुणशश्चन्त्यमन्त्ये पलाशै ॥६४ आवीतं लिपिभिः क्रमॊक्रमवशान्पाशाङ्कुशाभ्यामपि क्ष्मागेहद्वितयेन वेष्टदमिदं यन्त्रं गणाधीशितुः । लाक्षाकुङ्कुमरोचनामृगमदैर्भूर्जेवरे हेम्नि वा संलिख्याभिवहल्लभेत् सकलैः संप्रार्थनीयां श्रियम् ॥६५