भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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एकादश पटल ] [ २४५ ष्नु अरुण वर्ण वाला है। गण्ड स्थल गलते हुए मद के पूर से धोये हुए मुख कमल वाले है । ५०। ऐसे विघ्नगण है और उनकी प्रमदायें सब मद से घूर्णित लोचनों वाली है ।५१। ये सब अपने एक हाथों में कमल धारण करने वाली है और दूसरे करकमल से प्रिय को आलिङ्गित करने वाली है । षट् कोणों के पार्श्व भागों में क्रम से शंख और पद्म निधि का पूजन करना चाहिए । ५२। ये दोनों ही अपनी-अपनी प्रियाओं के सहित होंवे । इसके स्वरूप लक्षण पहिले ही बतला दिये हैं । केसरों में अङ्गों की पूजा करे और ब्राह्मणी आदि का पत्रों के मध्य में यजन करे ।५३। बाहिर लोकपालों का तथा उनके बाहिर वज्र आदि उनके आयुधों का यजन करना चाहिए । इस रीति से जप आदि के द्वारा मन्त्र सिद्ध होता है । फिर अपने वाञ्छित प्रयोगोंका साधन करे । आठ द्रव्यों के द्वारा अथवा अन्यों के द्वारा जो कल्प में प्रेरित किये गये हैं होम करे । पद्मों से भूपालों को और शुभ उत्पलों से उनकी पत्नियों को वश में करे । ५४-५५। विकसित कुमुदोंसे मन्त्रियों को और पीपल की श्रेष्ठ समिधाओं विप्रो को — गूलर की समिधाओं से होम के द्वारा नर-पतियों को वश में करना चाहिए । ५६। प्लक्षै वश्यान्वटोद्भूतैः शूद्रान्मन्त्री वशं नयेत् । मधुना स्वर्णलाभः स्याद्गोदुग्धेन लभेत गाः ।५७ आज्यहोमेन महतीं श्रियमाप्नोति मानवः । दध्ना सर्वसमृद्धिः स्यादन्नैरत्नपतिर्भवेत् । ५८ वृष्टिकामः प्रजुहुयाद्वेतसानां समिद्वरैः । कुसुम्भकुसुमैर्हुत्वा वासांसि लभतेऽचिरात् ।५६ प्रत्येकमादौ मूलेन चतुर्वारं प्रतर्पयेत् । श्रीशक्तिरतिभूलक्ष्मीः स्वबीजाद्याः प्रियान्विताः ।६० आमोदादीन् स्वबीजाद्यान् शक्तियुक्तांश्च तर्पयेत् । चतुश्चतुः पृथङ् मन्त्री शंखपद्मनिधी तथा । ६१