भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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२५० ] [ श्रीशारदा तिलक अङ्कस्थायाः सरसिजरुचेः स्वध्वजालम्बिपाणे- र्देव्यायोनौ विनिहितरं रत्नमौलिभजामः ।८१ लक्षमेकं संख्यं जपेन्मन्त्रं मधूकैस्तद्दशांशतः । जुहुयादर्चिते वह्नौ दिनशोदेवमर्चयेत् ।८२ प्रोक्ते पूजयेत्पीठे प्रागुक्तेनैव वर्त्मना । हुत्वेक्षुखण्डैर्मतिमान् राज्यश्रियमवाप्नुयात् ।८३ नालिकेरफलैस्तद्वद्रम्भापक्वफलैस्तुतः । ३ वशयत्यखिलं लोकं पृथुकैः शर्करान्वितैः ।८४ वशं नयति राजानं सक्तुभिर्ब्राह्मणान् शुभैः । घृतहोमेन धनवान् जायते नात्र संशयः ।८५ भक्ष्य-भोज्यादिक सबका हवन करके पुरुष अभीष्टों का साधन किया करता है। भक्ष्य लड्डू आदि है और भोज्य अन्न आदिहै। शक्ति से रुद्ध निज बीज, फिर महाग गणपति, यह कहे जिसके अन्त में चतुर्थी विभक्ति होवे—फिर, स्वाहा कहे—यह बारह अक्षरों वाला मन्त्र कहा है। इसका ऋषि गणक, छन्द गायत्री निष्टुदादिक है। तन्त्र में शक्ति गणाधिप देवता कहा गया है। मन्त्रके व्यस्त और समस्त पदों से अङ्गो की कल्पना करनी चाहिए ।७८-८०। अब ध्यान बताया जाता है— आपका वर्ण मुक्ताके तुल्य एकदम गौर है—पद से संयुत गज के समान मुख है—चूड़ा में चन्द्र को धारण करने वाले तथा तीन नेत्रों से युक्त से—अपने कर कमलों में अरविन्द-अंकुश-रत्न कुम्भ को धारण करने वाले हैं और अपनी गोद में विराजमान कमल की कान्ति वाली और अपने ध्वज पर समालम्बित कर वाली देवी की योनि में कर को निहत किए हुए—मस्तक में रत्न को धारण करने वाले देव का हम भजन करते हैं ।८१। इस मन्त्र को एक लाख जप और का दशांश मधू को से होम करना चाहिए । जो समर्चित वह्नि में करे और प्रति दिन देव का अर्चन करे ।८२। पूर्व में कहे हुए पीठ पर पूर्वोक्त मार्ग से ही यजन करना चाहिए । गतिमान् ईख के खण्डो से होम करके राज्य श्री को