भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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२५२ ] [ श्रीशारदा तिलक अंकुश धारण करने वाले हैं-अपने पुष्कर (सूँड) से अपनी प्रमदा के श्रेष्ठ अङ्ग का स्पर्श कर रहे हैं। ध्वज के अग्र भाग को स्पर्श करने वाली तथा कमल धारिणी इस श्यामांगी के द्वारा समालिंगित है-तीन नेत्रों से युक्त अर्ध चन्द्र को मस्तक में धारण करने वाले, भोग में अतीव चंचल, गज के समान मुख वाले, जमा के पुष्प के तुल्य रक्तवर्ण से युक्त विभु का निरन्तर स्मरण करता हूँ ।८८। इस मन्त्र का तीन लाख जप करना चाहिए तथा ईश के दन्डों से दशांश होम करे अथवा मन्त्र की सिद्धि के लिए आज्य से समन्वित पूओं से हवन करना चाहिए ।८६। प्रसन्न मन वाले व्यक्ति को अपने गुरुदेव को धन- धान्यादि के द्वारा प्रीणित करना चाहिए । पूजा पूर्व की ही भाँति अभीष्ट होती है। इसके अनन्तर काम्य प्रयोगों का साधन करे ।६०। तीन मधुगों से अक्त पूओं के द्वारा होम करके भूमण्डल में पार्थिवों की वश में ले आया करता है। चतुर्थी में नारियलों से हवन करके महती श्री को प्राप्त करता है । लवणैर्मधुसंयुक्तैर्वशयेद्वनिताजनम् । संवर्त्तकोनेत्रयुतः पार्श्वोह्नीयासनस्थितः ।६२ प्रसादनाथ हृन्मन्त्रः स्वबीज्यो दशाक्षरः । गणको मुनिरस्य स्याद्विराट्छद उदाहृतम् ।६३ क्षिप्रप्रसादिनो विघ्नो देवतास्य समीरिता । दीर्घयुक्तेन वोजेन षडङ्गानि प्रकल्पयेत् ।६४ पाशाङ्कुशौ कल्पलतां विषाणं दधत्स्वशुण्डांहितबीजपूरः । रक्तास्त्रिनेत्रस्तरुणेन्दुमौलिर्हसिज्ज्वलोहस्तिमुखोऽवताद्वः ।६५ लक्षं जपेज्जपस्यान्ते जुहुयादयुतं तिलैः । समधु (मधुर) त्रितयैर्द्रव्यैरथवाष्टाभिरीरितैः ।६६ एकाक्षसेदिते पीठे वक्ष्यमाणेन वर्त्मना । पूजयेद्गन्धपुष्पाद्यैर्धूपदीपैर्गजाननम् ।६७ अङ्गानि पूर्वमभ्यर्च्य विघ्नानष्टौ यजेत्ततः । विघ्नं विनायकं शूरवीरं वरसंज्ञकम् ।६८