शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ ] [ श्रीशारदा तिलक नारिकेलफलं पक्वं लोष्ठचर्मसमन्वितम् । जुहुयात्प्रत्यं न्त्री मण्डलात्सिद्धिमाप्नुयात् ॥१०२ जुहुयादष्टाभिर्द्रव्यैर्मधुरत्रयसंयुतैः । वश्येत्पार्थिवान्सर्वान् तत्पत्नीविधिनाऽमुना ॥१०३ दिनादिषु चतुश्चत्वारिंशद्वारैः शुभोदकैः । तर्पयेद्विघ्नराजस्य मस्तके श्रीप्रसिद्धये ॥१०४ पाशांकुशौ कल्पलतां स्वदन्तं करैर्वहन्तं कनकाद्रिकान्तम्। सोपानपङ्क्त्या दिनानाथविम्बादायान्तमम्भोजगतं विचिन्त्य।१०५ इसके अनन्तर लोकपालों का तथा उनके आयुधों का यजन करना चाहिए । इस रीति से भगवान् विघ्नेश्वर की पूजा कही गयी है । आज्य और अन्न से नित्य होम करे तो एक वर्ष में अन्नवान हो जाया करता है ॥१००। पायस और अन्न से हवन करने से मानव बहुत बड़ी श्री की प्राप्ति किया करता है । सुधी पुरुष आज्य के द्वारा हवन करके समस्त प्राणियों को अपने वश में कर लिया करता है ॥१०१। परिपक्व नारियल का फल जो लोष्ठ चर्म से संयुत होवे—मन्त्रधारी प्रतिदिन इससे होम करे तो एक मण्डल से सिद्धि को प्राप्त किया करता है । (यहाँ लोष्ठ शब्दमें अन्तर्वर्ती नारियल का ऊपर का भाग है और उसके ऊपर का भाग त्वचा है जिसको चर्म शब्द से कहा गया है) । मधुरत्रय से समन्वित आठ द्रव्यों से होम करे तो इस विधि से समस्त पार्थिवों को और उनकी पत्नियों को अपने वश में कर लेता है ॥१०२। १०३। दिन के आदि काल में शुभ जल से चौवालीस बार तर्पण करना चाहिए । श्री को प्रसिद्धि के लिए विघ्नराज के मस्तक में तर्पण करना चाहिए । श्री की प्रसिद्धि के लिए विघ्नराज के मस्तक में तर्पण करे ॥१०४। अब तर्पण करने से समय में विशेष ध्यान बतलाया जाता है - अपने करों से पाश-अंकुश-कल्पलता-अपना दाँत धारण करते हुए हैं और कनकाद्रिकान्त को वहन करने वाले हैं । सोपानों की पंक्ति के द्वारा दिननाथ के विम्ब से आगमन करते हुए हैं । और अम्भोज से स्थित हैं—ऐसा ही ध्यान करना चाहिए ॥१०५।