भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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२५८ ] [ श्रीशारदा तिलक अम्भोजाभयशक्तिकुक्कुटधरं रक्ताङ्गरागांशुकम् । सुब्रह्मण्यमुपास्महे प्रणमतां भीतिप्रणाशोद्यतम् ।१२३ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं साज्येन हविषा ततः । दशांशं जुहुयादन्ते ब्राह्मणानापि भोजयेत् ।१२४ धर्म्मादिकल्पिते पीठे वह्निमण्डलपश्चिमे । पूजयेद्विधिना देवमुपचारैर्यथोदितैः ।१२५ केसरेष्वङ्गपूजा स्यात्पत्रमध्यगतानिमान् । जयन्ताख्यमग्निवेश्यं कृत्तिकापुत्रसंज्ञकम् ।१२६ इसके अनन्तर ऐहि एहि भगवान् सर्व खाद्य और स्तम्भय-इन को दो-दो बार कहे । भुवनेशी का अपना बीज-ह्रीं गं-नतिः पावक वल्लभा अर्थात् स्वाहा कहे । फिर आमान्त अंकुश कहे-यह माला मन्त्र पचपन अक्षरों वाला होता है । इस माला मन्त्र के द्वारा साधक सुधी अपने प्रयोगों का साधन करे ।१२०-१२१। अब सुब्रह्मण्य मन्त्र को बतलाते हैं-प्रणव-खगीश-वः, कूर्म-चकार, निःस्वर-स्वर से हीन, णान्तः-तकार, भुवे यह स्वरूप हैं । फिर नति नमः-यह पद कहे-यह सुब्रह्मण्य के स्वरूप वाला मन्त्र सात वर्षों वाला होता है । षट् दीर्घ से युक्त वह्नि बाज से हङ्गक्रिया मानी गयी है ।१२२। अब ध्यान बतलाया जाता है-सिन्दूर के समान कान्ति से युक्त चन्द्र के समान मुख वाले-केयूर और हार आदि परम दिव्य भूषणों से विभूषित शरीर से समन्वित-स्वर्ग के सौख्य के प्रदान करने वाले -- करों से कमल, अभयदान-शक्ति और कुक्कुटको धारण करने वाले-रक्त अङ्गराग से युक्त वस्त्र वाले - प्रीति और प्रमाण को उद्यत रहते हैं जो प्रणाम करने वाले हैं ऐसे सुब्रह्मण्य देवकी हम उपासना करते हैं ।१२३। इस मन्त्र का एक लाख जप करना चाहिये । और घृत के सहित हविसे जप का दशांश होम करे और अन्त में ब्राह्मणोंको भोजन करना चाहिये ।१२४। वह्नि मण्डल के पश्चिम में धर्म्मादि से कल्पित पीठ पर यथो- चित उपचारों के द्वारा विधि के साथ देवता का पूजन करना चाहिए । केसरों से अङ्ग पूजा करे तो ये पत्रों के मध्य संस्थित है ।१२५-१२६।