शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 255, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादश पटल ] [ २५७ करे और अपना अभीप्सित का साधन करना चाहिए । षष्ठी तिथि में मोदकों के द्वारा होम करे तथा अष्टमी में कृशरों से हवन करना चाहिए ।११४। चतुर्दशी तिथि में पूओं से वांछितों की प्राप्ति के लिये होम करना चाहिये । इस मन्त्र सहित द्रव्यों के द्वारा मन्त्रधारी पूर्व दिनों में भी आहुतियाँ देवे । साधक बिना ही पत्रों के सब कामों का साधन करे ।११५। सर्व प्रथम कमल का लेखन करे जिसमें आठ दल होवे । मध्य में अपने बीज के अन्तर में साध्य का नाम लिखे । जो अंक मन्त्रों से भूषित किञ्जल्क से संशोभित होवे । साध्य के साथ साधक और उसके कार्य को लिखना चाहिए । पत्रों के उदर में सात प्रकार से विभाग करके माला मन्त्र को शेषित वर्णों को अन्तिम दल में लिखे और शक्ति और प्रकार से परिवृत करे । रोचना मद और काश्मीर से भोज पत्र में उसे लिखे । फिर क्रम से सूत्र से और तीन लोहों से वेष्टित करे । इस मन्त्र बाँधी ‘वाह मे’ धारण करे तो साधक सभी कामनाओं को प्राप्त कर लिया करता है । शक्ति- अंकुश को ध्रुव के अन्त में लिखे फिर अपना बीज और हृदय लिखे, अन्त में चतुर्थी विभक्ति के अन्त वाले सर्व विघ्नाधिपाय लिखे तो यह सब अर्थों की सिद्धि का देने वाला होता है । इसके पश्चात् सर्वा दुःख प्रशमनाय-यह पद कहे ।११६-११९। एह्येहि भगवन्सर्व खादय स्तम्भय द्वयम् । भुवनेशी स्वबीजजाङ्ग नतिः पावकवल्लभाः ।१२० पुनरङ्कुशमायान्तं पञ्चपञ्चाशदक्षरः । मालामन्त्रेण मनुना प्रयोगान् साधयेत्सुधीः ।१२१ तारं खङ्गीश्वरः कूर्मो निःस्वरेणान्तईरित । ध्रुवे नतिः सप्तवर्णः सुब्रह्मण्यात्मकोमनुः । वह्निबीजेन षड्दीर्घयुक्तेनाङ्गक्रिया मता ।१२२ सिन्दूरारुणकान्तिमिन्दुवदनं केयूरहारादिभि- र्दिव्यैराभरणैर्विभूषिततनुं स्वगस्य सौख्यप्रदम् ।