शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 254, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें२५६ ] [ श्रीशारदा तिलक इस मन्त्र का तीन लाख जप करे और जप को दशांश तिलों से होम करना चाहिये । तीव्रा आदि से पूजित पीठकर हेरम्ब देव का अर्चन करे ।११०। प्रणव-कवच द्वन्द्व अर्थात् हुँ-हुँ और फिर ग, इसके पीछे हेरम्ब-यह पद आसन के लिये हृदन्वित होवे ।१११। यह आसन का मन्त्र होता है । इस मन्त्र से आसन अर्पित करना चाहिये । जिसके प्रणव कादि में होवे ऐसे विघ्न के बीज के द्वारा उनकी मूर्ति को प्रकल्पित करे ।११२। आवाह्य पूजयेत्तस्यामङ्गावरणसंयुतम् । वाह्ये लोकेश्वरा पूज्या वज्रादीनि ततः परम् ।११३ एवमभ्यर्चयेन्नित्यं साधयेत्स्वमभीप्सितम् । मोदकैर्जुहुयात्षष्ठ्यामष्टम्यां कृशरैस्तथा ।११४ चतुर्दशीदिनेऽपूपैर्यजुहुयाद्वाञ्छिताप्तये । एभिर्द्रव्यैः प्रजुहुयान्मन्त्रो पूर्वदिनेष्वपि । साधयेत्सकलान्कामान्यत्नेनैव साधकः ।११५ अम्भोजं प्रथमं लिखेद्वसुदलं मध्ये स्वबीजान्तरे । साध्याख्याम्बहिरङ्गमन्त्रविलसत्किञ्जल्कसंशोभितम् । पत्राणामुदरे विभज्य मुनिशो मालामनुं शेषिता- षड् वर्णंश्चरमे दले परिवृत शक्त्या शकारेण च ।११६ रोचनामदकाश्मीरैर्भूजपत्रे विलिख्य तत् । वेष्टित श्वेतसूत्रेण लोहैस्त्रिभिरपि क्रमात् ।११७ धारयेद्बाहुना यंत्र सर्वान्कामानवाप्नुयात् । शक्त्यङकुशोध्ववान्ते स्यात्स्वबीजं हृदयं ततः ।११८ सर्वविघ्नाधिपायन्ते ङेऽन्तं सर्वार्थसिद्धिदम् । प्रवदेत्सर्वदुःखप्रशमनाय पदं ततः ।११६ उस मूर्ति में आवाहन करके अङ्गावरण से समन्वित का अर्चन करना चाहिए । बाहिर में लोकेश्वरों का अर्चन करे और उनके बाहिर वज्रादि उनके आयुधों का यजन करे ।११३। इसी रीतिमें नित्य अर्चन