भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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एकादश पटल । ] [ २६३ स्वत्तो न चान्यत्प्रतिपाद्यमेतैस्तदस्तित चेत्सर्वमसत्यकल्पम् ।१४८ हिरण्यगर्भं जगदीशितारमृषि पुराणं रविमण्डलस्थम् । गजाननं यं प्रविशन्ति संतस्तत्कालयोगैस्यमहं प्रपद्ये ।१४६ वेदान्तगीतं पुरुषं भजेऽहमात्मानन्दघनं हृदिस्थम् । गजाननं यन्महसा जनानां महाऽन्धकारोविलयं प्रयाति ।१५० शम्भोः समालोक्य जटाकलापं शशाङ्कखण्डं निजपुष्करेण । स्वभग्नदन्तं प्रविचिन्त्य मोग्धांदाक्रष्टु रुक्तमः श्रियमातनोतु ।१५१ विघ्नार्गलानां विनिपातनाथंयं नारिकेलैः कदलीफलाद्यैः । प्रभाव (साद) यन्तोमदवारणास्यम्त्रापूर्नरोऽभीष्टमहं भजेतम् ।१५२ यज्ञै रनेकैर्र्बहुभिस्तपोभिराराध्यमाद्यं गजराजचक्रं । स्तुत्याऽनता ये विधिना स्तुवन्ति ते सर्वलक्ष्मीनिधयोभवंति ।१५३ जो पूर्व में गजानन आपकी आराधना करके उनके समस्त शास्त्रों को पढ़ते हैं, वे आपसे अन्य प्रतिपादन करनेके योग्य नहीं है। यदि ऐसा हो तो वह सब असत्य कल्पना ही है ।१४८। हिरण्यगर्भ-जगत् के ईश- ऋृषि-पुराण और रविमंडल में संस्थित जिस गजानन के अन्दर काल के योगों द्वारा प्रवेश करता है, उनकी शरणागति में गमन करता हूँ ।१४६। वेदान्त में गान किये गये-आनन्द घन अर्थात् घनी-भूत आनन्द स्वरूप हृदय में स्थित आत्म गजानन का में सेवन करता हूँ । जिसके तेज से जनों का महान् अन्धकार विलोनता को प्राप्त हो जाया करता है ।१५०। भगवान् शम्भु के जटाजूटमें चन्द्रमा के खन्ड को समालोकित करके अपना भग्न हुआ दाँत समझकर अपनी सूँड के अग्रभाग से मुग्धता से उसे खींच लेने की इच्छा वाले होते हैं । ऐसे श्री गणेशजी हमारी श्री का विस्तार करें ।१५१। विघ्नों की अर्गला के विनिपालन करने के लिये जिसको नारियलों से तथा कदली के फलादि के द्वारा प्रसन्न करते हुए मद वारणस्य को प्राप्त हुए नरों से अभीष्ट उन गणेश का भजन करता हूँ ।१५२। अनेक यज्ञों के द्वारा बहुत से