शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 263, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादश पटल ] [ २६५ इसके अनन्तर समस्त समृद्धियों के प्रदान करने वाले चन्द्रमा के मन्त्र को बतलाया है-सौभाग्य और हृदयान्त अर्थात् जिनके अन्त में हृदय है-यह छै अक्षरों वाला मन्त्र होता है। मन्त्र का उद्धार यह होता है-खङ्गीश-त्रः उसमें स्थित भृगु-सः। वह बिन्दु अनुस्वार से समुन्वित है। भृगु इसका ऋषि है छन्दपंक्ति है और इसका देवता सोम है। दीर्घ का सेवन वाले अपने ही बीज के द्वारा इस मन्त्र की अङ्ग क्रिया करनी चाहिए ।१-२। कर्पूर और स्फटिक के समान अवदात अर्थात् श्वेत और निरन्तर पूर्ण चन्द्रमा के समान मुखबिम्ब वाले- मोतियों की माला से विभूषित वपु से अन्धकारका निर्मूलन करने वाले तथा हाथों से कुमुद ओर वर को धारण करने वाले-नीले अलकों से उद्भासित-अपने अंक में स्थित मृग चिह्न से उदित आश्चर्य गुण वाले सुधा के सागर सोमका ही मैं भजन करता है ।३। साधना करने वालेको अपनी इन्द्रियों को जीतकर छः लाख मन्त्र जप करना चाहिये। छै सहस्र का होम करना चाहिये। पायस और घृत मे ही हवन करे ।४। पूजित पीठ पर सोमान्त रोहिणी के पतिका पूजन करे। केसरों में अङ्गों का यजन करना चाहिए। उसकी देवियों का पत्त्रों के मध्य में पूजन करे ।५। रोहिणी कृत्तिका रेवती, भरणी, रात्रि, आर्द्रा, ज्योति, कला,ये सब हीर के समान प्रभा वाली है ।६। ये श्वेत माल्यों की धारण करने वाली है और मुक्ताओं के हारों से विभूषित हैं। पयोधरों के भार से समाक्रान्त है और शुभा तथा हाथों की अं जलियाँ बांधे हुई हैं ।७। वल्लभाभक्तमनसी मदविभ्रममन्थराः । समभ्यर्च्य्याः सरोजाक्ष्यश्चन्द्रबिम्बनिभाननाः ।८ आदित्यमङ्गल बुधमन्दवाक्पतिराहवाः । शुक्रकेतुयुताः पूज्या दलाग्रेषु ग्रहा इमे ।६ स्वस्ववर्णज्वरोपेताः स्वनामद्यर्णबीजकाः । रक्तारुणश्वेतनीलपीतधूम्रसितासिताः ।१०