भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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२७० ] [ श्रीशारदा तिलक वसुलक्षं जपेन्मंत्र समिद्भिः क्षीरशाखिनाम् । तत्सहस्रं प्रजुहुयात् क्षीराक्ताभिर्जितेन्द्रियः । ३७ पीठस्य क्लृप्तेः प्रथमं दिक्षु मध्ये च संयजेत् । प्रभूतं विमलं सारं समाराध्यमनन्तरम् । ३८ परमादिसुखं पीठं स्वम्बिान्तं प्रकल्पयेत् । दीप्तः सूक्ष्मा जया भद्रा विभूतिर्विमला पुनः ।.६। अमोघा विद्युता सर्वतोमुखी पीठशक्तयः । दीप्तदीपशिखाकारा बीजान्यासां विदुः क्रमात् ।४० इस तरह से शरीर में न्यास किया हुआ साधक तेजों के निधि का चिंतन करे । ३५। ध्यान-हाथों में रक्त कमलो का जोड़ा और अभय- दान धारण करने वाले केयूर-अङ्गद हार आदि भूषणों से अन्वित- मस्तक में माणिक्य धारी-बन्धूक पुष्प के समान कांति वाले-तीन नेत्रों से भूषित दिन नाथ का मैं स्तवन करता हूँ । ३६। दूधवाले वृक्षोंकी समिधाओं से आठ लाख मन्त्र का जप करके एक सहस्र का होम करे । क्षीर से अवन समिधाओं से तन्द्रा रहित होकर हवन करना चाहिये । ३७। क्लृप्त पीठ के प्रथम दिशाओं में और पीछे मध्य में यजन करे । अनन्तर में प्रभूत, विमल और सार का समाराधन करके अपने विम्बके अन्त में परमादि सुख पीठ की कल्पना करनी चाहिए । पीठ शक्तियोंके नामों का परिगणन किया जाता है-दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, मुद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युता, और सर्वतोमुखी-ये पीठ शक्तियाँ होती हैं । क्रम से बीजन्यास दीप्त दीप की शिखा के आकार वाली का जानना चाहिए । ३८-४०। अक्लीवह्रस्वत्रितस्वरान् बिन्दुग्निसंयुतान् । वदेत्पदं चतुर्थ्यन्तं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् । ४१ सौराय योगपीठाय तमः पदमनंतरम् । पीठमंत्रोऽयमाख्यातो दिनेशस्य जगतपतेः ।४२