भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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द्वादश पटल ] | २६६ अ.त्रद, स्य अन्तिम होता है। यह भानुदेय का अभिमत का प्रदाता आठ अक्षरों वाला मन्त्र बताया गया है। कल्याण हृदय कहा है और ब्रह्मणे शिर कहा गया है। २७-२६। विष्णवे स्याच्छिखा वर्म रुद्राय परिकीर्तितम् । अग्नयेनेत्रमाख्यातं शर्वाययास्त्रमुदीरितम् । ३० तेजोज्वालामणिहुंफट्द्विठान्ताः पृथगीरिताः । अंगमन्त्रान्विन्यस्येत्पञ्च मूर्तीर्यथाक्रमम् । ३१ आदित्यं विन्यसेन्मूर्ध्नि रविं मुखगतं न्यसत् । हृदये भानुनामनं भास्करं गुह्यदेशतः । ३२ सूर्य चरणयोर्न्यस्येद्व्रस्वैः सद्यादिपञ्चभिः । प्रधानमूर्तिप्रतिमाःसर्वाभरणभूषिताः । ३३ मूर्द्धास्यकण्ठहृदयकुक्षिनाभिध्वजाङ्घ्रिषु । मन्त्रवर्णान् न्यसेक्यो प्रत्येकं प्रणवादिकान् । ३४ विष्णवे - यह शिखा है, रुद्राय - वह वर्म कीर्तित किया गया है। अन्नेये नेत्र कहा है और शर्वाय अस्त्र होता है। दो ठकार और स्वाहा है, तेजो ज्वाला मणिहूँ फट् - यह होता है। फिर अङ्ग मन्त्रोंका न्यास करना चाहिये और यथा क्रम पाँच मूर्तियों का करे । ३०-३१। आदित्य का मूर्धा में विन्यास करे और रवि का मुख में न्यास करे। हृदम में भानु का और भास्कर का गुह्य देश में न्यास करना चाहिये । ३२। सूर्य, का चरणों में सद्यादि पाच व्याहृतियोंहैके साथ न्यास करे। प्रधान मूर्ति की प्रतिमायें सग आभरणों से भूषित हों । ३३। मूर्धा, मुख, कण्ठ हृदय, कुक्षि, नाभि, ध्वज और चरणोंमें प्रणव जिसके आदिमें होवे ऐसे प्रत्येक मन्त्र के वर्णों का न्यास करना चाहिए। ३३-३४। एवं न्यस्यशरीरोऽसौ चिन्तयेत्तेजसांनिधिम् । ३५ रक्ताब्जयुग्माऽभयदानहस्तं केयूरहारांगदभूषणाढ्यम् । मणिक्यमौलिं दिननाथमीडे बन्धूककान्ति विलसत्त्रिनेत्रम् । ३६