शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 266, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें२६८ ] [ श्रीशारदा तिलक अन्य मण्डल में सोम का अर्चन करके सुधी को चाँदी से निर्मित चषक से वहाँपर आगे स्थापित करना चाहिये ।२१। गायके दूध से समापूरित करके उसका स्पर्श करे और इस मन्त्र का जप करे । पीछे एक सौ आठ विद्या तन्त्र के द्वारा आचार्य चन्द्रमा के लिए सब कार्यों की विधि के लिये अर्घ्य देवे । इसी विधिसे प्रत्येक मासमें अतन्द्रित रहकर करना चाहिये ।२२-२३। षण्मासाभ्यन्तरे सिद्धि साधकेन्द्रः समश्नुते । प्रियमत्पूर्जितान् पुत्रान् सौभाग्यं पुष्कलं यशः ।२४ कन्याभिष्टामवप्नोति कन्यापि वरमाप्नुयात् । वहुना किमिहोक्तेन सर्व दद्यान्निशापतिः ।२५ विद्ये विद्यामालिनति स्याच्चन्द्रिण्यन्ते ततो भवेत् । पुनश्चन्द्रमुखिस्वाहा विद्यामन्त्र उदाहृतः । २६ ततोघृणिर्भृ गः पश्चाद्वामकर्णविभूषितः । वह्न्यासनेामरुच्छेषेः ससुत्रोत्रिस्त्यपश्चिमः ।२७ अष्टाक्षरोमनुःप्रोक्तोभानोरभिमतप्रदः । देवनागोमुनिः प्राक्तोगायत्री छन्द ईरितम् ।२८ आदित्यो देवता प्रोक्तोदृष्टादृष्टफलप्रदः । सत्याय हृदयं प्रोक्तं ब्रह्मणे शिर ईरितम् ।२६ इससे छै मास के अन्दर ही साधक सिद्धियों प्राप्तकर लिया करता है । श्री-अत्यन्त ऊर्जित पुत्र-सौ भाग्य-पुष्कल यश-अभीष्ट कन्या और कन्या भी अभीष्ट वर की प्राप्ति करती है। बहुत अधिक कथन से क्या लाभ है यही पर्याप्त है कि चन्द्रदेव सभी कुछ दे दिया करते हैं। ।२४-२५। मन्त्रका उद्धार बताया जाता है-विद्ये विद्यामालिनि- चन्द्रिणि चन्द्रमुखि स्वाहा-यह विद्या मन्त्र बताया गया है ।२६। अब- सूर्य का मन्त्र बताया जाता है-घृणि-वह स्वरूप है, भृगु-सः नाम वर्ण-ऊ-इससे भूषित अर्थात् 'सू'-मरुन - यकार, वह्नि-रेफ के आसन वाला अर्थात् जिस पर रकार हो, शेष-ना, सेमेघ इकार युक्त