भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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द्वादश पटल ] [ २६७ । ४। मस्तक में चन्द्र का चिन्तन करते हुए पूर्व कथित संख्या में जप करे तो वह रोग—अपमृत्यु और दुःखों को जीतकर सौ वर्ष तक स्थित रहा करता है । १५। ब्रह्मचर्य से रत होकर शुद्ध होवे और इसका चार लाख जप करे तो यत्न रहित होते हुए भी भूमि में रहने वाले निधान को तुरन्त ही प्राप्त कर लेता है ।१६। जितेन्द्रियो जपेन्मंत्रं पौर्णमास्यां विशेषतः । भवेत्सौभाग्यनिलयः सम्पदामपरोनिधि ।१७ घोरान् ज्वरान् शिरोरोगानभिचारानुपद्रवान् । विष,णमपि संघातं नशियेन्मनुनाऽमुना ।१८ पूर्णमास्या निराहारो दद्यादर्घं विदूदये । प्राक्प्रत्यगायतं कुर्याद्भूतले मण्डलत्रयम् ।१६ निषण्णः पश्चिमे मन्त्री मण्डले विहितासने । मध्यस्थे स्थापयेत्पश्चात् पूजाद्रव्याण्यशेषतः ।२० अन्यस्मिन्मण्डले सोममर्चयित्वाम्बुलान्विते । राजतं चषकं तत्र स्थापयेत् पुरतः सुधीः ।२१ गोदुग्धेन समापूर्य स्पृष्ट्वा तं प्रजपेन्मनुम् । अष्टोत्तरशतं पश्चाद्विद्यामन्त्रेण देशिकः ।२२ दद्यादर्घं शशाङ्काय सर्वकार्यार्थसिद्धये । अनेन विधिना कुर्यात्प्रतिमासमहतन्द्रितः ।२३ मन्त्र का जप जितेन्द्रिय होकर करे और विशेष रुप से पौर्णमासी में करे तो वह सौभाग्यका स्थान हो जाता है और सम्पदाओं का दूसरा निधि ही बन जाया करता है ।१७। इस मन्त्र के द्वारा घोर ज्वर-शिरो रोग-अभिचार-उपद्रव विषों के संघानों का विनाश कर दिया करता है ।१८। पौर्णमासी में निराहार रहकर चन्द्रोदय के समय में चन्द्रमाको अर्घ्य देवे । पूर्व और पश्चिममें भूतलायत तीनमण्डल बनावे ।१९। मन्त्रधारी मण्डल में विहित आसन पर पश्चिम में स्थित होवे । पीछे मध्य में सम्पूर्ण पूजा ने द्रव्यों को स्थापित करे ।२०। अम्बुजान्वित