शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें२७४ ] [ श्रीशारदा तिलक क्रम से तीनों बीजों का न्यास करना चाहिये । षट् दीर्घस्वर स युक्त मध्य से अङ्ग क्रिया मानी गयी है ।६०। अब ध्यान कहा जाता है- रक्त अम्बुज के आसन वाले, सम्पूर्ण गुणों का एक महासागर, समस्त जगतों का स्वामी, करकमलों में दो पद्म, वर और अभयदान को धारण करती हुई, मस्तक में माणिक्य रखने वाले, अरुण अङ्ग रुचि से सम- न्वित, तीन नेत्रों के धारण करने वाले भानुदेव का मैं भजन करता हूँ अर्थात् यजन करता हूँ ।६१। भानुलक्षं जपेन्मन्त्रमन्त्राज्येन दशांशतः । तिलैर्वा मधुरासिक्तै र्जुहुयाद्विजितेन्द्रियः ।६२ पूर्वोक्ते पूजयेत्पीठे विधानंनामुना रविम् । प्रथमावृत्तिरङ्गैः स्यात् परा चन्द्रादिभिर्ग्रहैः ।६३ तृतीया लोकपालैः स्याच्चतुर्थी स्यात्तदायुधैः । इति संपूज्य निर्माल्यं तेजश्चन्द्राय दीयताम् ।६४ अर्घं प्रागीरितं दद्याद्भानवे संयतेन्द्रियः । सोऽपि रत्नं धनं धान्यं पुत्रपौत्रान्पशूंस्तथा ।६५ वस्त्राणि भूषणादीनि दद्यादस्मै न संशयः । आकाशमग्निपवनसद्यान्तोऽधीशबिन्दुमत् ।६६ मार्त्तण्डभैरवं नाम बीजमेतदुदोहृतम् । पुटितं विम्बबीजेन सर्वकामफलप्रदम् ।६७ ठान्तं दहननेत्रेन्दुसहित तदुदीरितम् । पञ्चह्रस्वाद्यबीजेन पञ्चमूर्त्ति प्रविन्यसेत् ।६८ बारह लाख मन्त्र का जप करे । इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला जप का दशांश घृत से अथवा मधुर से अक्त तिलों से होम करना चाहिए । इसी विधान से पूर्वमें कथित पीठ में रवि का अभ्यर्चन करे । प्रथम आवृत्ति अंगों से होती है और परा आवृत्ति चन्द्र प्रभृति ग्रहों से होती है ।६२-३३, तीसरी आवृत्ति लोक पालों से की जाती है तथा चौथी आवृत्ति उन लोक पालो के आयुधों से होती है । इस रीति से भली भांति पूजन करके निर्माल्य और तेज चन्द्र के लिये देवे ।६४।