शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादश पटल ] [ २७५ सप्त इन्द्रियों वाला होकर भानु देव के लिये पूर्व में वर्णित अर्घ देना चाहिये । वह भी रत्न, धान्य, पुत्र, पौत्र तथा पशुओं को और वस्त्र और भूषण आदि इसके लिये दे दिया करते हैं-इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है । अब मार्त्तण्ड भैरवी बीज बतलाया जाता है-आकाश- हः, अग्नि-रेफ, पवन-यः, सद्यान्त-ओ, अधीश-ऊः जो बिन्दु से संयुत होता है-यह मार्त्तण्ड भैरव नामक बीज कहा गया है। यह विम्ब बीज के साथ सम्पुटित किये जाने पर सब मनोरथों के फल का प्रदान करने वाला हुआ करता है ।६७। टान्त-ठः, दहन-रेफ, नेत्र-इ, बिन्दु से सहित होवे अर्थात् अनुस्वार से समन्वित होवे ऐसा यह कहा गया है । पाँच ह्रस्वाद्य बीज से पंच मूर्ति का विन्यास करना चाहिए ।६८। मध्यमादिकनिष्ठान्तमङ्गुलीषु क्रमादिकाः । सूर्याख्यो भास्करो भानुस्तथा रविदिवाकरौ ।६६ शिरोवदनहृद्गुह्यपाददेशे तु ताः पुनः । दीर्घ युक्तेन बीजेन नेत्रान्ताङ्गानि विन्यसेत् । व्यापकं मूलबीजेन कुर्वीत तदनन्तरम् ।७० हेमाम्भोजप्रवालप्रतिमनिजरुचि चारुखट्वाङ्गपद्मे । चक्रं शक्तिं च पाशं सृणिमतिरुचिरामक्षमालां कपालम् । हस्ताम्भोजैर्दधानं त्रिनयनविलसद्देववक्त्राभिरामम् । मार्त्तण्डं वल्लभाद्धं फणिमयमुकुट हारदीप्तं भजामः ।७१ लक्षत्रयं जपेन्मन्त्री बीजं बिम्बपुटीकृतम् । दशांशं कमलैः फुल्लैर्जुहुयान्मधुरीक्षितैः ।७२ पीठे दीप्तादिभिर्युक्तैः कर्णिकायामुषादिकाः । पूर्वादिदिक्षु संपूज्य मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् ।७३ मध्यमा से आदि लेकर कनिष्ठिका के अन्त तक अंगुलियों में क्रम से विन्यास करे । सूर्य्य भास्कर, भानु, रवि, दिवाकर फिरउनको शिर- मुख, हृदय, गुह्य और पादों के देश में दीर्घ युक्त बीज से नेत्रान्त अंगों का विन्यास करे । उसके अनन्तर मूल बीज से व्यापक न्यास करना चाहिए ।६६-७०। अब ध्यान बतलाते हैं-हेम, अम्भोज, प्रवाल के