शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 278, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें२७८ ] [ श्रीशारदा तिलक करते हुए मणिमय दिव्य कल्पों से शोभित, विश्व के मूल, सौम्याग्नेय, तीन नेत्रों से सयुत चन्द्रचूड का वपु आपकी रक्षा करे ॥८३॥ भानुलक्षं जपेन्मन्त्रं पायसेन ससर्पिषा । दशांश जुहुयात्सम्यक् ततः सिद्धो भवेन्मनुः ।८४ दीप्तादिपूजिते पीठे प्रागुक्ते पूजयेद्विभुम् । मूत्तिं मूलेन सङ्कल्प्य यजेदङ्गादिभिः सह ।८५ क्रतुं वसुं नरवरौ दिग्दलेषु विदिक्ष्वथ । अर्चयेहृतजां गोजामब्जाख्यामद्रिजां पुनः ।८६ लोकेश्वरांस्तदस्त्राणि पूजयेदेवमन्वहम् । अर्घं च विधिवद्दद्यात्प्राक् प्रोक्तेनैव वर्त्मना ।८७ मन्त्राद्यमातृकाङ्कपूर्णकुम्भं निधाय तम् । पिधाय वामहस्तेन न्यस्तमन्त्रेण संयतः ।८८ इस मन्त्र का बारह लाख जप करना चाहिए घृत से संयुत पायस से जप का दशांश होम करे फिर यह मन्त्र सिद्ध होजाया करता है ।८४ पूर्व में कथित दीप्त आदि से पूजित पीठ में विभु का अर्चन करे । मूल मन्त्र से मूत्ति की कल्पना करके फिर अंगादि के साथ यजन करना चाहिए।८५। क्रतु वसु और नरवरों का यजन करे । दिशाओं के दलों में और विदिशाओं में ऋतजा-गोजा-अन्जा और अद्रिजा का यजन करना चाहिये ।८६। प्रति दिन लोकेशों का तथा उसके आयुधोंका इसी भाँति पूजन करे। पूर्व में वर्णित विधान से ही विधि के साथ अर्थ देना चाहिए ।८७। मन्त्राद्य मातृका पद्म सम्पूर्ण उस कुम्भ को रखकर वाम कर से ढककर न्यास किये हुए मन्त्र द्वारा संयत होकर करे ।८८। अष्टोत्तरशतं मन्त्रं जपेत्तोयं सुधामयम् । स्मृत्वा तेनाभिषिञ्चेद्यं स भवेद्विगतामयः ।८६ आयुरारोग्यविकवानमिताल्लभते नरः । अनेनैव विधानेन विषार्त्तोनिर्विषो भवेत् ।६०